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Sunday, 29 March 2026

पुराण के कारण अगर हिन्दू समाज में फूट हैं, तब फिर पुराणो को न मानने वाले आर्यसमाजियों में तो बड़ी एकता होनी चाहिए, किन्तु क्या ऐसा हैं ?

पुराण के कारण अगर हिन्दू समाज में फूट है , तब फिर पुराणो को न मानने वाले आर्यसमाजियों में तो बड़ी एकता होनी चाहिए, किन्तु क्या ऐसा हैं? एक किताब (सत्यार्थ प्रकाश), एक रसूल (स्वामी दयानन्द) और एक खुदा (कल्पित निराकार ) को मानने वाला आर्यसमाज भारत का ऐसा संगठन है जिसमें सर्वाधिक विवाद आपस में ही होते रहते हैं। अनेक सभाए बनी है आपस में झगड़ती रहती हैं। बल्कि एक खुदा , एक रसूल और एक किताब वाले होकर भी आर्यसमाजियों में अधिकांश धार्मिक सिद्धांतो को लेकर भी मतभेद व झगड़े होते रहते है व बड़े बड़े झगड़े इनमें हुए हैं संगठन दो दो हिस्सो में बंट गया है, एक दूसरे के विरुद्ध लेख तो क्या किताबे तक लिखी गई है...यह एकता तो न हुई..तब क्यो न आर्यसमाजी अपनी सत्यार्थ प्रकाश का बहिष्कार करके एकता स्थापित करने का प्रयास करके एक बार देखे?

इस पर तैयार न हो और अगर स्पष्ट विरोधाभास के उदाहरण देखने है तो हम वह सत्यार्थ प्रकाश सहित स्वामी दयानन्द के ही ग्रंथो से दिखाएंगे, किसी एक दो को नहीं लगभग सभी सिद्धांतो को लेकर, तब क्या इसी ईमानदारी के साथ आर्यसमाजी सत्यार्थ प्रकाश और स्वामी दयानन्द का बहिष्कार करने को तैयार होंगे? 

हिन्दू समाज की राजनीतिक पराजयों का कारण केंद्रीय राजनैतिक व सैन्य शक्ति का अभाव, आंतरिक कलहे आदि रहे , न कि कोई धार्मिक ग्रंथ ... ऐसी मूर्खतापूर्ण बात वही व्यक्ति कह सकता हैं जिसका राजनीति और इतिहास का ज्ञान शून्य हो अथवा अपने पंथ के कारण मूर्खता या धूर्तता की उच्चतम स्थिति को प्राप्त कर चुका हो। पुराण तो एकात्मकता में विविधता के पोषक है, और यह हिन्दू समाज की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति हैं...

इनका तर्क है पुराण में एक देवता की प्रशंसा और दूसरे की निंदा है, जबकि दूसरे पुराण में इसके विपरीत है।यह विरोधाभास है?

आर्यसमाजी या तो शास्त्रों की शैली को नहीं समझते, अथवा समझते हुए भी हिन्दू जनता की दृष्टि में अपने ही धर्मग्रंथों के प्रति घृणा उत्पन्न कराकर उन्हें अपने दयानन्दी पंथ में लाने के लिए ठगविद्या का सहारा लेते हैं।

किसी इष्ट वस्तु की ओर प्रवृत्ति कराने और अन्य से निवृत्ति कराने के लिए अर्थवाद का आश्रय लिया जाता है। यह अर्थवाद केवल पुराणों में ही नहीं, वेद की संहिता तथा ब्राह्मण भागों में भी विद्यमान है।पुराण वेदों का ही अनुसरण करते हैं। एक देवता को अन्य देवताओं से बड़ा बताना यह अर्थवाद वेदों में भी है , तब पुराण में भला क्यो न होगा?

अर्थवाद के तीन भेद होते हैं - प्रथम गुणवाद, द्वितीय अनुवाद, तृतीय भूतार्थवाद।

गुणवाद में अपनी इष्ट वस्तु की अत्यधिक प्रशंसा तथा उस जैसी दूसरी वस्तु की निंदा की जाती है, किन्तु वहाँ दूसरी वस्तु के लिए वास्तव में निंदा इष्ट नहीं होती, बल्कि अपनी इष्ट वस्तु की प्रशंसा में वह निंदा पर्यवसित हो जाती है। अनुवाद में अनेक बार भिन्न-भिन्न युक्तियों एवं प्रकारों से अपनी इष्ट वस्तु की प्रशंसा व महिमा कही जाती है। भूतार्थवाद में किसी कल्पित अथवा परम्पराप्राप्त आख्यान के द्वारा अपनी इष्ट वस्तु की प्रशंसा तथा उससे भिन्न की निंदा की जाती है। यह प्राचीन वैदिक शैली है।

जो विद्वान् तथा सारग्राही होते हैं, वे केवल तात्पर्य देखते हैं, किन्तु जो भगवान् की भक्ति एवं उनकी कृपा से रहित अविद्वान् होते हैं, वे उन शब्दों के अर्थ की उलझन में पड़कर रह जाते हैं। यदि कहीं अर्थवाद से किसी की निंदा हो तो वे उसे सच में की गई निंदा समझने की मूर्खता कर बैठते हैं, जबकि वहाँ अर्थवाद का आश्रय लेने का कारण इष्ट में प्रवृत्ति कराना है - इसे वे समझ नहीं पाते।

मीमांसादर्शन के शाबरभाष्य में इसे स्पष्ट किया गया है - “न हि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम्” (१.४.२६)। अर्थात् शास्त्रों में निंदा अपने से निंदित किए हुए की निंदा के लिए नहीं, बल्कि अपनी वस्तु की प्रशंसा-स्तुति आदि के लिए होती है। देखिए, इतना स्पष्ट कहा गया है। साथ ही इस सूत्र के भाष्य में अर्थवाद के उदाहरण भी दिए गए हैं।

जैसे -“अपशवो वा अन्ये गोअश्वेभ्यः, पशवो गोअश्वाः”—अर्थात् कहा जाता है कि गाय व घोड़े के अलावा अन्य सब अपशु हैं। क्या इसका शब्दार्थ मात्र लिया जाएगा? तब अन्य पशुओं की उत्पत्ति व्यर्थ हो जाएगी? अथवा क्या उन्हें आर्यसमाजी कहा जाएगा? अथवा वे न पशु रहेंगे न आर्यसमाजी, तब क्या उन्हें मार डालने का आदेश इससे समझा जाएगा? हल्की नजर वाले आर्यसमाजी कुछ ऐसे ही भाव पुराणों से ग्रहण करते हैं, जबकि यहाँ स्पष्ट है कि गाय और घोड़े की विशिष्टता ही इष्ट है। इसी प्रकार कहा जाता है कि “जो घी से रहित है, वह भोजन ही नहीं”।

जैसे ये अर्थवाद के सरल उदाहरण हैं, वैसे ही पुराणों में एक-दूसरे देवताओं की निंदा अर्थवाद ही है।

मीमांसादर्शन में जर्तिल और गवीधूक से हवन की निंदा तथा अजाक्षीर (बकरी के दूध) की प्रशंसा की गई है। यह भी अर्थवाद का ही उदाहरण है, जो अन्य शाखाओं वालों के लिए है।

इसी प्रकार देवीभागवत में शक्ति को सबसे बड़ा बताना स्वाभाविक है, शिवपुराण में शिवजी को तथा विष्णुपुराण में श्रीविष्णु को सर्वोच्च बताना स्वाभाविक है । तब अपने इष्ट में निष्ठा बढ़ाने व स्थिर करने के लिए अर्थवाद का आश्रय लिया जाता है।

देवीभागवत में कहा गया - “धूर्तैः पुराणचतुरैः” यहाँ अन्य पुराणों की निंदा नहीं है, यह भी स्पष्ट अर्थवाद है। “विरोधे गुणवादः स्यात्” अर्थवाद की शास्त्रीय परिभाषा से देवी एवं देवीपुराण की ही महिमा यहाँ अपेक्षित है। क्योंकि यदि यहाँ पुराण की निंदा होती तो देवीभागवत भी तो एक पुराण ही है, वह भी धूर्तों द्वारा बनाया सिद्ध होता। अतः यहाँ “पुराणचतुरैः” शब्द का अर्थ “पुराण बनाने वाले” नहीं, बल्कि “पुराने चतुर लोग” है। सम्भवतः इसी श्लोक को पढ़कर अविद्वान् स्वामी दयानन्द भ्रमित हो गए थे तथा देवीभागवत को वैदिक एवं व्यासकृत मानने लगे थे तथा अन्य पुराणों की निंदा करने लगे थे। (स्वामी दयानन्द अधेड़ आयु के थे उस समय देवी भागवत को शुद्ध, वैदिक व महर्षि व्यास कृत बताकर इसकी महिमा गाया करते थे)

हमारे ऋषि समझते थे कि जो जिसका इष्ट है, वह उसी की उपासना करे, क्योंकि किसी अन्य की उपासना में लगेगा तो “इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः” न्याय का उदाहरण बनेगा। अब इस अर्थवाद के उदाहरण वेदो में देखे - 

सामवेद के पवमानपर्व में सोम को सबसे बड़ा कहा गया है—“सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवः” (५.६.५)। यहाँ सोम को सब देवताओं का उत्पादक कहा है।

अथर्ववेद में ब्रह्मचारी को ही सबका उत्पादक कहा गया है—“ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्म अपो लोकम्” 

यजुर्वेद में रुद्र की अतिशयित स्तुति है, उन्हें सर्वोच्च कहा गया है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में आदिशक्ति वाक् को सर्वोच्च कहा गया हैं।

ऋग्वेद में - “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव...” - यहाँ विष्णु देवता की अतिशय स्तुति है। फिर अथर्ववेद ४.१६ में वरुण को सर्वशक्तिमान कहा गया है।

सामवेद में “न त्वावान् अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते” - में इन्द्र को सबसे बड़ा देव बताया गया है।

“कालो ह सर्वस्येश्वरः” (अथर्ववेद) - यहाँ काल को ही सबसे बड़ा तथा सबका ईश्वर कहा गया है।

ऋग्वेद में - “न वा ओजीयो रुद्र त्वदस्ति” - में रुद्र को ही सब देवों से बड़ा व बलवान् बताया गया है।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण वेदों से प्राप्त होते हैं। कहीं ऋग्वेद में मन्यु देवता को बड़ा बताया है, तो कहीं प्राण की महिमा गाते हुए कहा गया कि प्राण से ही सब प्रतिष्ठित है।

क्या इसे विरोधाभास माना जाएगा? क्या यह कहा जाएगा कि वेद के इन भिन्न-भिन्न प्रकरणों को बनाने वाले भिन्न-भिन्न मनुष्य हैं? क्या कहा जाएगा कि इनमें एक-दूसरे की वास्तविक निंदा की गई है? क्या आर्यसमाजी वेदों का भी बहिष्कार करके हिन्दू एकता स्थापित करना चाहेंगे? जो इसका उत्तर है, वही उत्तर पुराणों के लिए है।

किसी एक को जब सबसे बड़ा बताया जाता है, तब दूसरे को स्वतः ही छोटा बनाकर निंदित कर दिया जाता है। वेदों में यह निंदा अप्रकट है, क्योंकि वे उच्च अधिकारियों के लिए हैं। पुराणों में यह शैली अधिक स्पष्टता से वर्णित है, क्योंकि वे मध्यम अधिकारियों के लिए हैं। शेष लौकिक काव्य साहित्य साधारण अधिकारियों के लिए है, उसमें रस द्वारा वह बात व्यक्त की जाती है।

अतः एक देव की अतिशयित प्रशंसा एवं दूसरे की निंदा अपने इष्टदेव में निष्ठा की स्थापना के लिए होती है, न कि उसका उद्देश्य वास्तविक निंदा होता है।

जैसे वेदों की भिन्न-भिन्न संहिताओं में एक जैसे मंत्रों में कुछ पाठभेद मिलते हैं और उनके ब्राह्मण अपने पाठ को ठीक तथा दूसरे पाठ को मानुष बताते हैं, वहाँ भी इसी एकनिष्ठता का तात्पर्य होता है। क्रमशः
✍️शचींद्र शर्मा 

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