यह गूढ़ प्रश्न आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम वाली पोस्ट पर आया है।
उत्तर: नमस्ते मित्र,
बहुत सुंदर और गहन प्रश्न उठाया है आपने। आभार।
आपने पारंपरिक क्रम बताया – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ, शं – और यह सही भी है। पर यहाँ एक बारीक लेकिन बहुत ज़रूरी अंतर समझना होगा, जो अक्सर कंफ्यूजन पैदा करता है। मैं आपके साथ इसे खोलकर रखता हूँ, उसी पोस्ट "आज्ञाचक्र: मास्टर चाबी, ध्वनियाँ और अन्य आयाम" के संदर्भ में।
1. बीज मंत्र और पंखुड़ी की ध्वनियाँ – दो अलग चीज़ें हैं
आपने जो क्रम लिखा – लं (मूलाधार), वं (स्वाधिष्ठान), रं (मणिपूर), यं (अनाहत), हं (विशुद्धि), ॐ (आज्ञा), शं (सहस्रार या बिंदु) – यह हर चक्र का बीज मंत्र है। हर चक्र का अपना एक तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, महत्) और उस तत्व की ध्वनि-ऊर्जा है। यह मंत्र जप के लिए हैं, तत्व शुद्धि और चक्र जागरण की विधियों में काम आते हैं। विशुद्धि का बीज “हं” है, आज्ञा का बीज प्रमुख रूप से “ॐ” है। यह बिल्कुल शास्त्रसम्मत है।
2. आज्ञाचक्र का कमल और उसकी दो पंखुड़ियाँ – हं और क्षं
अब आज्ञाचक्र का जो प्रतीक है – दो पंखुड़ियों वाला कमल – उन दो पंखुड़ियों पर जो अक्षर लिखे हैं, वे हैं “हं” और “क्षं”। शास्त्रों में इसे स्पष्ट कहा गया है – हं (हं) और क्षं (क्षं) ये दो वर्ण आज्ञा दल के हैं। यह पंखुड़ियों की ध्वनि ऊर्जा है, बीज मंत्र नहीं। इसे हम “पंखुड़ी-ध्वनि” या “प्राण-धारा की ध्वनि” कह सकते हैं।
मेरी पोस्ट में जो “हं और क्षं” आया है, वह ठीक इसी को इंगित कर रहा है। मैंने लिखा है – “दो मुख्य ध्वनियाँ सामने आती हैं – हं और क्षं। ये दोनों कोई मंत्र नहीं, बल्कि प्राण की ही दो अलग-अलग धाराएँ हैं।” जब आप अनुभव के गहरे स्तर पर जाओगे ऐसा पाओगे।
अर्थात यहाँ जप करने का मंत्र नहीं बताया गया, बल्कि जब साधक भीतर गहराता है तो प्राण की फ्रीक्वेंसी स्वतः इन दो मूल ध्वनि-पैटर्न के रूप में सुनाई देने लगती है। यह कोई मानसिक उच्चार नहीं, अनाहत नाद का स्तर है।
3. फिर विशुद्धि के “हं” और आज्ञा के “हं” का क्या संबंध?
विशुद्धि का बीज मंत्र “हं” है, और आज्ञा दल का पहला अक्षर भी “हं” (हं) है। दोनों में ध्वनि समान है, पर ऊर्जा का स्तर भिन्न है। विशुद्धि पर “हं” आकाश तत्व की बीज ध्वनि के रूप में कंपन करता है, जबकि आज्ञा पर आते-आते वही “हं” प्राण की उस धारा में ढल जाता है जो पीले से नीले प्रकाश में बदलती है और अंततः ॐ में विलीन होती है। इसलिए पोस्ट में कहा कि ये दोनों ॐ के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।
हम यह भी कह सकते हैं – विशुद्धि का “हं” शुद्धि करता है, आज्ञा का “हं” आयामों को खोलता है।
4. “क्षं” और “शं” का भेद भी समझे
आपने लिखा “शं“ "ब्रह्मरंध्र” या सहस्रार के लिए है कुछ ग्रंथों में “शं” (शं) या “क्षं” दोनों का उल्लेख मिलता है, यह परंपरा पर निर्भर करता है। कई क्रमों में मूलाधार से विशुद्धि तक लं, वं, रं, यं, हं और फिर आज्ञा के लिए ॐ, उसके बाद “क्षं” सहस्रार या बिंदु का संकेत करता है। मेरी पोस्ट में “क्षं” आज्ञा की दूसरी पंखुड़ी का प्राण स्पंद है, कोई अंतिम बीज मंत्र नहीं।
यानी पारंपरिक बीज मंत्र क्रम – लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – बिल्कुल अपनी जगह पर स्थापित है। और आज्ञा के भीतर के गहन अनुभव में हं और क्षं वो दो प्राण-धाराएँ हैं जो 48-48 फ्रीक्वेंसी में टूटकर प्रकाश बन जाती हैं। इसे कहीं से भी विरोध नहीं है।
5. 48-48 का राज़ और पंखुड़ियों का गणित भी समझे
पोस्ट में बताया गया कि हं के भीतर 48 सूक्ष्म ध्वनियाँ और क्षं के भीतर 48 – यह कोई यादृच्छिक संख्या नहीं है। योग शास्त्रों में भी मानव शरीर में कुल 96 अंगुलियाँ (उँगलियों के पोरुओं की संख्या) बताई गई हैं, जो 48-48 के जोड़े में नाड़ियों और चेतना की लय से जुड़ी हैं। जब आज्ञाचक्र जागता है, तो यह पूरी बायो-इलेक्ट्रिक व्यवस्था एक साथ प्रकाश-स्पंद में बदलती अनुभव होती है। यही कारण है कि कमल की दो पंखुड़ियाँ हैं – हर पंखुड़ी अपने भीतर 48 स्पंदनों को समेटे है।
6. तो क्या ओम का जप छोड़ दें? इसको भी समझे।
बिल्कुल नहीं
आपने कहा कि “आज्ञा चक्र पर तो ॐ जप बताया गया है” – और यह परम सत्य है। मेरी पूरी पोस्ट का निचोड़ ही यही है कि अंततः सब कुछ ॐ में ही समा जाता है। मैने लिखा है – “ये दोनों ध्वनियाँ ॐ ध्वनि ऊर्जा पैटर्न के साथ ओवरलैप होती हैं, अनुनादित होती हैं।” और गहरे में जाने पर “शेष रहता है केवल सफेद प्रकाश – वह कोरी ऊर्जा है, ही ॐ है, ही शून्य है।”
अर्थात हं और क्षं का स्वतः उठना और ॐ में विलय – यह साधना का आंतरिक अनुभव है। जप की विधि में आप ॐ का ही आश्रय लेंगे, यह सर्वथा उचित और प्रभावी भी है।
7. एक बात और समझे
उस पोस्ट का दूसरा अंश आयामों (डाइमेंशन) के बारे में है। जब आज्ञाचक्र पर हं और क्षं की ये दो धाराएँ अपनी पूरी 48-48 की गहराई में खुलती हैं, तो चेतना का फ्रीक्वेंसी बैंड इतना चौड़ा हो जाता है कि वह केवल तीन आयामों में कैद नहीं रहती। तब साधक अन्य आयामों के प्राणियों और लोकों का अनुभव कर सकता है। यह कोई मंत्र जप से थोड़े में होने वाली बात नहीं, यह वर्षों की साधना से प्राण की धाराओं के इस रूपांतरण का परिणाम है।
मित्र
आपका प्रश्न बीज मंत्र क्रम और आज्ञा की पंखुड़ियों की ध्वनियों के संगम पर खड़ा है, और इस अंतर को उजागर करना बहुत ज़रूरी है।
· बीज मंत्र : लं, वं, रं, यं, हं, ॐ – चक्र जप और तत्व शुद्धि के लिए।
· पंखुड़ी की प्राण-ध्वनियाँ (जो सिर्फ गूढ़ ध्यान में सुनाई देती हैं) : हं और क्षं – आज्ञा दल पर।
ये दोनों आपस में टकराते नहीं, बल्कि एक ही सीढ़ी के दो स्तर हैं। बीज मंत्र से शुरू करके, एक दिन साधक जब पूर्ण मौन और प्राण के सूक्ष्म कंपनों में डूबता है, तो उसे हं और क्षं का यह द्वार खुलता है, जो उसे ॐ रूपी अनंत में ले जाता है।
आपकी जिज्ञासा उत्तम है। ऐसे प्रश्न ही साधना को कोरी मान्यता से उतारकर अनुभव की वास्तविकता में बदलते हैं।
ॐ शांति
साभार - टैलीपैथी
No comments:
Post a Comment