आर्यसमाजी दशकों से इस झूठ को फैला रहे हैं। वे यह बताते हैं कि पहली बार स्वामी दयानन्द ने ही इस शब्द को कहा एवं अन्य क्रांतिकारियों ने स्वामी दयानन्द से ही इस शब्द को सुना व प्रयोग किया। इस झूठ को सत्य दिखाने के लिए ये अनेक क्रांतिकारियों के नाम से झूठे उद्धरण भी देते हैं। जैसे कि देखो - फलाने क्रांतिकारी ने कहा था कि - "स्वामी दयानन्द ही स्वराज्य के प्रथम मंत्रदाता थे"। किन्तु ऐसा उस क्रांतिकारी ने कभी नहीं कहा होता।
स्वराज्य शब्द का प्रयोग दादाभाई नैरोजी ने किया था, उन्होंने कहीं पर भी नहीं कहा कि मैंने यह शब्द सत्यार्थ प्रकाश से सीखा। बाल गंगाधर तिलक ने इस शब्द को प्रसिद्ध कर दिया था, उन्होंने भी कहीं पर नहीं कहा कि यह शब्द मैंने सत्यार्थ प्रकाश से सीखा। किन्तु आर्यसमाजी फिर भी इस झूठ को बोलते हैं। अपने पंथ और अपने पंथ-प्रवर्तक को सर्वोच्च दिखाने के लिए पंथ के अंधे अनुयायी ही इस प्रकार झूठ बोला करते हैं।
अगर ये कहते हैं कि दादाभाई तथा तिलक से पूर्व दयानंद की पुस्तक में यह शब्द मिलता है, तो इस अनुमान से यह माना जाए कि इन्होंने वहीं से यह शब्द लिया है, तो इस पर हम आर्यसमाजियों से पूछना चाहते हैं कि - "छत्रपति शिवाजी महाराज को जानते हो? वे दयानन्द से पूर्व थे या नहीं?"
शिवाजी महाराज द्वारा किया गया उद्घोष - 'हिंदवी स्वराज्य' सुना है या नहीं?
शिवाजी महाराज द्वारा स्वराज्य का प्रयोग प्रामाणिक रूप से उनके पत्रों और तत्कालीन मराठी साहित्य में, समकालीन अभिलेखों में मिलता है - “हे राज्य स्वराज्य आहे…”, “स्वराज्याच्या कार्यासाठी…” आदि। शिवाजी महाराज को तो स्वराज्य-संस्थापक ही तत्कालीन दस्तावेजों में कहा गया है।
क्या आपने किसी आर्यसमाजी को कहते सुना है कि - स्वराज्य का प्रयोग सर्वप्रथम करने वाले शिवाजी महाराज थे? अगर स्वामी दयानन्द शिवाजी महाराज से पहले हुये होते तो निश्चित ही आर्यसमाजी यह कहते कि - "इनको लड़ने की प्रेरणा स्वामी दयानन्द से मिली थी, और स्वराज्य शब्द इन्हौने सत्यार्थ प्रकाश के लिया था।
दुनिया भर के झूठ बोलकर दयानन्द को सबसे ऊपर दिखाना ही इनका प्रमुख धर्म है। यह कहना पूर्णतः असत्य है कि स्वामी दयानन्द ने इस शब्द को बनाया, या इस शब्द का प्रयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे, या कि अन्य सबने इनसे ही यह शब्द सीखा था। शिवाजी महाराज को यह शब्द कहाँ से मिला था?
यह शब्द धर्मग्रंथो में भी आता है - “अहि॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्”, “तत्स्व॒राज्य॑मियाय॒” आदि।
प्रतिमानाटकम् जैसी महाकवि भास की रचनाओं तथा दयानन्द से पूर्व के संस्कृत साहित्य में अनेक स्थानों पर यह शब्द व भाव प्रकट होता है। ये सब दयानन्द स्वामी से काफी समय पूर्व के हैं।
तो नैरोजी, गंगाधर तिलक आदि ने जो स्वराज्य का प्रयोग किया, वह स्वामी दयानन्द से नहीं, बल्कि शिवाजी महाराज से प्रेरित होकर किया था, ऐसा क्यों न माना जाए?
इस स्वराज्य को प्रसिद्ध करने वाले बाल गंगाधर तिलक तथा दादाभाई नैरोजी, ये दोनों ही महाराष्ट्र राज्य के थे। क्या उन्होंने शिवाजी महाराज को न पढ़ा होगा?
तत्कालीन क्रांतिकारियों द्वारा लिखित पुस्तकों व संस्मरणों में यह उल्लेख मिलता है कि उस समय, स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करने हेतु शिवाजी महाराज के ये "स्वराज्य" संबंधी कथन पत्रों व पर्चों पर छापे जाते थे। केसरी आदि पत्रों में शिवाजी महाराज की उक्तियाँ छपा करती थीं, जिनमें स्वराज्य की बात होती थी। केसरी पत्र तिलक का था, जिसमें वे महाराज शिवाजी का महिमा-मंडन करते थे, जिससे क्रांतिकारियों को प्रेरणा मिले।
तब आर्यसमाजियों ने यह क्यों न कहा कि स्वराज्य की प्रेरणा इन क्रांतिकारियों को शिवाजी महाराज से मिली थी?
आप विचार करें कि ये आर्यसमाजी अपने पंथ-प्रवर्तक दयानन्द स्वामी को सर्वोच्च दिखाने के लिए किस प्रकार वास्तविक तथ्यों की अवहेलना करके झूठा प्रचार करते हैं।
साभार - ✍️शचींद्र शर्मा
संदर्भ - https://www.facebook.com/share/18pEXjCutL/
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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