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Tuesday, 28 April 2026

भारतीय वैदिक धर्मशास्त्र व्यवस्था में चतुर्वर्ण के लिए कर्तव्य और उच्च वर्ग के लिए कठोर दण्डविधान

कभी जरा सा अपने शास्त्रों को पढ़ कर देखना । देखना उसमें क्या लिखा है ! 
सबसे ज्यादा नियम , कानून , restrictions , विधि , निषेध , यह नहीं करना है , वह नहीं करना है , ऐसा करना है , वैसा करना है , ऐसे बैठना है , ऐसे चलना है , ऐसे सोना है , यह खाना है , यह नहीं खाना है , यहाँ बैठना है , यहाँ नहीं बैठना है इत्यादि ब्राह्मणों के लिए बनाये गए हैं ।

इसके बाद क्षत्रियों के लिए , फिर वैश्यों के लिए और शूद्रों के लिए तो मात्र 10% ही नियम है । 

एक ब्राह्मण को यग्योपवीत होने के बाद क्या खाना है , क्या पीना है , कैसे रहना है , कितना खाना है , कब उठना है , कब बैठना है , कब स्नान करना है , कौन से दिन क्या खाना है , कैसे रहना है इत्यादि पढ़कर आप फफक फफक कर रोने लगेंगे । 
पागल हो जायेंगे आप ! 
इतना ही नहीं द्विज , पुरोहित , विप्र , आचार्य सबके लिए अलग अलग नियम ।
और जो ब्रह्मचारी और सन्यासी हो जाता है उसके लिए तो कठोरतम नियम है । इसके हाथ का नहीं , इस अग्नि पर नहीं , इस दिशा में नहीं , इस स्थान पर नहीं , पृथ्वी पर पैर रखते वक्त कौन सी नाड़ी , इस दिशा में चलते वक़्त कौन सी नाड़ी , उक्त कार्य करते वक़्त कौन सी नाड़ी चलनी चाहिए इत्यादि तक नियम कानून बनाये गए हैं ।

आपने अगर किसी अशुद्ध तत्व का विचार भी कर लिया तो उसके लिए भी घोर दंड और प्रायश्चित का विधान है । छू लिया या उसके कारण आपकी मानसिकता भी दूषित हुई तो न जाने इतनी बार डुबकी लगाने का प्रावधान है । 

एक ही अपराध के लिए ब्राह्मण को मृत्युदंड तक है , उसी अपराध के लिए क्षत्रिय को आजीवन कारावास , उसी अपराध के लिए वैश्य को कुछ वर्ष का कारावास और उसी अपराध के लिए शुद्र को बस कोड़े मार कर छोड़ दिये जाने का विधान है ।
लेकिन फिर इसका उल्टा भी कहीं कहीं विशेष परिस्थिति में है । 

इतना सब कुछ होने के बावज़ूद भी कभी ब्राह्मण ने अपने शास्त्र नहीं जलाए और न ही यह कहा कि जान बूझ कर ब्राह्मणों को सताने के लिए यह शास्त्र लिखे गए हैं और न ही शोषण का रोना रोया । 

इतिहास उठा कर देख लीजिये , इतिहास साक्षी है जब भी राक्षसों और असामाजिक तत्वों का या कोई भी बाहरी संस्कृति का आक्रमण हुआ है ,उन्होंने सबसे पहले ब्राह्मणों की हत्याएं की हैं और ब्राह्मण ही असुरों के कोप का भाजन बना है । 
जंगलों में , कुटिया बनाकर , सभी विलासिता पूर्ण जीवन को त्याग कर कठोर तप नियम संयम का आचरण करते हुए भी उसने यह नहीं कहा कि हमारा शोषण हो रहा है या अत्याचार हुआ ।

अब क्षत्रियों पर आ जाईये । 
यह एक ऐसी प्रजाति रही है जिसने प्रजा पालन के लिए अपने स्त्री , पुत्र , रिश्तेदार, यहाँ तक कि स्वयं को दांव पर लगा दिया । अपने शरीर का मांस तक काट काट कर इसने प्रजा की रक्षा के लिए तिरोहित कर दिया ।
किसी से भी लोहा लेना हो ,कोई भी आक्रमण हो , क्षत्रियों ने पहला वार अपनी छाती पर खाया है । अपने 10 से लेकर 16 वर्ष तक के पुत्रों की बलि हँसते हँसते इसने चढ़ा दी । 
वीर क्षत्राणी हँसते हँसते अपने पुत्रों को युद्धक्षेत्र में भेजती थी कि आज ही के दिन के लिए एक क्षत्राणी अपने पुत्र को जन्म देती है । 
अपने पुत्र, पति , भाई , पिता को इन्होंने ही सबसे ज्यादा खोया है । और इसके बाद यह भी हँसते हँसते जौहर कर लेती थी । 
किसके लिए ???? 
इन्हीं शास्त्रों के बताए नियम और कानून, मर्यादा की रक्षा के लिए क्योंकि शास्त्रों ने क्षत्रियों को यही धर्म बताया है कि सबकी रक्षा का दायित्व इन्हीं के ऊपर है ।
इन लोगों ने कभी यह नहीं कहा कि हे वैश्य , हे ब्राह्मण , हे शुद्र , तुम लोग जाओ युद्ध भूमि में , हम ही क्यों जायें और मरें ।

बल्कि अगर कोई शुद्र , ब्राह्मण या वैश्य बोलता भी था तो इनके लिए डूब मरने वाली बात होती थी कि इनके रहते युद्धभूमि में कोई कैसे जा सकता है । 
इतिहास साक्षी रहा है जितना युद्ध की विभीषिका क्षत्रियों ने झेला है और देश के मान की रक्षा के लिए कुर्बानी दी है , उतना किसी भी जाति ने नही दी है । 

लेकिन फिर भी इन्होंने कभी शास्त्र नहीं जलाए ,न ही शोषण का रोना रोया कि ब्राह्मणों , वैश्यों और शूद्रों ने चालाकी करके हमें मरने के लिए लिख दिया या छोड़ दिया या इन लोगों ने हमारा शोषण किया । 

अब आईये वैश्य पर !! 

यह वह प्रजाति रही है जो सदा से डकैतों , लुटेरों द्वारा लूटी गई है । 
युद्ध जीतने के बाद इन्हीं पर धावा बोला जाता था और इनके जीवन भर की मेहनत कर कर के कमाई हुई धन संपत्ति लूट ली जाती थी ।
जब देश पर युद्धकाल में भीषण संकट आता था या कोई प्राकृतिक आपदा आती थी , तो यही रहते थे जो अपना सर्वस्व दान कर देते थे । बड़े बड़े राजाओं को इन लोगों ने देश हित में अपने परिवार और भविष्य की परवाह न करते हुए सब कुछ दान किया है और देश को संकट से उबारा है । 
व्यापार करने दूर दूर तक जाते थे अपने परिवार से वर्षों विलग रहकर , मेहनत करके कमा कर जब लौटते थे तो डकैतों , नक्सलियों द्वारा इनके धन को लूट लिया जाता था और मार तक दिया जाता था । 
लेकिन फिर भी यह व्यापार करते थे क्योंकि शास्त्रों ने इनको यही धर्म बताया था कि तुम व्यापार से देश और समाज का भरण पोषण करो । 

लेकिन इन्होंने कभी शास्त्र नहीं जलाए और न ही शोषण का रोना रोया । 
जानते हो क्यों ???? 
क्योंकि इन सभी में अपना स्वाभिमान था , गर्वित भाव था अपने लिए । बस यही एक अंतर था । 

लेकिन शूद्रों के लिए ?? शास्त्र उठा लो और देख लो , सबसे ज्यादा freedom , liberty इसी जाति को दी गयी है । इसके लिए कोई कठोर नियम नहीं है कि क्या खाना है , कब खाना है , कितना खाना है , क्या करना है , क्या नहीं करना है , तुम कैसे भी रह सकते हो , नहाओ या न नहाओ , मांस खाओ या न खाओ , शराब पियो या न पियो , जुवा खेलो या न खेलो , कुछ भी करो , कोई कठोर नियम नहीं ।

बस इतना कहा गया कि उपरोक्त जो भी जाति अपने नियम , विधि निषेध का पालन कर रही है उसमें उसके पालन करने के लिए सहायक बनो , बाधक मत बनो । 
बस यही एक reason रहा जहाँ तुम्हारे लिए विधि निषेध शुरू हो जाता है । 

लेकिन तुमने इसको भी न मानकर और शास्त्रों की बातों का उल्टा अर्थ लगा लगा कर उसको जलाना और गरियाना शुरू कर दिया । शोषण शोषण का रोना रो रो कर रावण की तरह विलाप शुरू कर दिया । 

तुम तो किसी के आक्रमण का कभी केंद्र ही नहीं रहे । किसी ने भी तुमको कभी समूल नष्ट करने की विचार पर बल भी नहीं दिया, जितना कि उपरोक्त तीनों जातियों को ।

लेकिन तब भी तुम्हारा रोना चालू रहा । 

कभी सोचकर देखना कि इन वामपंथियों ने , इतिहासकारों ने और देश तोड़ने वालों ने तुम्हे कितना अंदर से खोखला कर दिया है । तुम्हें बरगलाकर अपने ही भाईयों , समाज और धर्म के खिलाफ गाली निकलवाई जाती है । इतना कमजोर कर दिया गया है और तुम हाथ छुड़ाकर इतने दूर चले गए हो कि बस वह ताक में हैं कि तुम कमजोर पड़ो और तुम पर वह हावी होकर तुम पर राज करें।  

इन सब बातों को समझो , अपनी संस्कृति , अपने धर्म , अपने शास्त्रों का सम्मान करो और दुबारा लौट आओ । 

जिस दिन तुम अपने भगवान , अपने देवी देवता , अपने शास्त्रों , अपने कुल , अपनी मर्यादा , अपने समाज के अन्य जातियों को गालियाँ देना बंद कर उनका सम्मान करना शुरू करोगे और अपना रोना न रोकर अपने संस्कृति पर , स्वयं पर स्वाभिमान पूर्वक गर्व करना शुरू कर दोगे , उस दिन दोनों भुजायें फैलाये सभी लोग तुम्हारा आलिंगन करेंगे । 

इन वामियों और देश विरोधी तत्वों के स्वप्न को चकनाचूर कर वापस अपने जड़ों में दुबारा लौट आओ । 

साभार - Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )
आध्यात्मिक दिग्दर्शक 
Shwet Prem Ras 
www.ShwetPremRas.in
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                         वयं राष्ट्रे जागृयाम 
तिथि - मिति वैशाख शुक्ल १३, विक्रम २०८३, बुधवार 
दिनांक 29/4/2026 ईस्वी 

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