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Monday, 27 April 2026

" सवारी आना " मानवीय चेतना का एक अनसुलझा और विस्मयकारी क्षेत्र ।

प्रश्न: हमारे गाँव में सवारी आती है (किसी को काली की, किसी को देवताओं की) और वे सब सही-सही बता देते हैं। इसका विज्ञान सरल भाषा में बताइए। यह कैसे संभव होता है और देवी-देवताओं का विज्ञान भी समझाइए।

उत्तर:

देखिए, यह प्रश्न हमारे गाँव-देहात की उस परंपरा से जुड़ा है जिसे हम सबने कभी न कभी अनुभव किया है। कोई काली माँ की सवारी की बात करता है, कोई हनुमान जी की। सामने खड़ा व्यक्ति अचानक बदला-बदला सा लगने लगता है, उसकी आवाज़, चेहरा, हाव-भाव सब बदल जाते हैं और वह ऐसी बातें बताने लगता है जो सुनने वाले को एकदम अपनी लगती हैं। इसे आधुनिक भाषा में ट्रान्स पज़ेशन या शैमेनिक अवस्था कहते हैं, लेकिन यह कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि मानव चेतना की एक गहरी और प्राचीन क्षमता है।

सबसे पहले समझते हैं कि सवारी आने की प्रक्रिया में हमारे दिमाग की कौन सी अवस्थाएँ काम करती हैं। यह तीन स्तरों पर घटता है।

पहली अवस्था है गहरी ट्रान्स की। जब लगातार ढोल-नगाड़ों की थाप बज रही हो, मंत्रों का उच्चारण हो रहा हो, धूप-अगरबत्ती का धुआँ और पूरे वातावरण में एक अलग ही समाँ बंध गया हो, तब हमारे दिमाग के सामान्य फ़िल्टर बंद होने लगते हैं। यह वैसी ही अवस्था है जैसे कोई गहरे ध्यान में चला जाए या किसी संगीत में पूरी तरह खो जाए। यहाँ एक बात और समझने की है। 

पहाड़ी इलाकों में एक विशेष प्रकार के चमड़े से बना ढोल प्रयोग किया जाता है जिसकी ध्वनि बहुत गूँजदार और भेदक होती है। जब वह ढोल बजता है तो सुनने वाले अक्सर कहते हैं कि भीतर से चीखने-चिल्लाने का मन करता है। वह आवाज़ सीधे कानों को भेदकर अंतर्मन के गहरे तारों को छू लेती है। 

दरअसल यह ध्वनि की फ्रिक्वेंसी का खेल है, जो मस्तिष्क की सामान्य तरंगों को तोड़कर सीधे भीतर उतर जाती है। जिस व्यक्ति का अंतर्मन मुक्त होना चाहता है, वह उसी आवेग में चिल्ला पड़ता है, दौड़ने लगता है, नाचने लगता है। विज्ञान कहता है कि इस समय हमारे मस्तिष्क में अल्फा और थीटा तरंगें हावी हो जाती हैं, जो न जागने और न सोने के बीच की अवस्था है। यही वह दरवाजा है जहाँ से सवारी उतरती है।

दूसरी अवस्था है अचेतन मन का जाग्रत हो जाना। हमारा मस्तिष्क दो हिस्सों में काम करता है, चेतन और अचेतन। चेतन मन दिनभर की छोटी-मोटी बातें देखता है, लेकिन अचेतन मन में पूरे परिवार, गाँव और पीढ़ियों की यादें, छवियाँ, डर और शक्तियाँ जमा रहती हैं। जब व्यक्ति ट्रान्स में जाता है, तो उसका चेतन मन हट जाता है और अचेतन सामने आ जाता है।

• बचपन से सुनी कहानियाँ और देखी छवियाँ अचेतन में मौजूद रहती हैं।
• सवारी के समय उसका अपना दिमाग ही उस भूमिका को जीने लगता है, ठीक वैसे जैसे कोई कलाकार मंच पर अपना व्यक्तित्व भूलकर पात्र बन जाता है।
• मनोविज्ञान इसे डिसोसिएशन कहता है, स्वयं से अलग होकर किसी और रूप में काम करना।

यहाँ एक और परत जोड़िए जो अक्सर लोग नहीं पकड़ पाते। जो व्यक्ति दिनभर देवी के मंत्रों का जाप कर रहा है, उसी माहौल में रह रहा है, वहाँ तो भीतर की ज़मीन पहले से ही तैयार है। और जब नवरात्रि का समय आता है, तो यह माहौल और भी घना हो जाता है।

 नवरात्रि के नौ दिन ब्रह्मांड की एक विशेष ऊर्जा अपने चरम पर होती है, इसे शक्ति की प्रचंडता का काल कहा जाता है। धार्मिक भाषा में इसे देवी का धरती पर अवतरण कहते हैं, लेकिन वैज्ञानिक रूप से देखें तो यह सामूहिक चेतना के एकत्र होने का विस्फोट है। इतने लोग एक साथ, एक ही भाव से, एक ही दिशा में ऊर्जा लगा रहे हैं, तो वह वातावरण एक प्रचंड मानसिक ऊर्जा-क्षेत्र बना देता है। इसी घने माहौल में साधक का अंतर्मन उन शक्तियों से कनेक्ट हो जाता है और सवारी का आना और सहज हो जाता है।

अब तीसरी और सबसे रोचक बात आती है, बिना पूछे सही-सही बता देने का रहस्य। इसके पीछे तीन तत्व काम कर रहे होते हैं, जिनका मिश्रण ही इस अनुभव को चमत्कार बना देता है।

पहला तत्व है अतिचेतन अवलोकन। जब दिमाग का चेतन भाग शांत होता है, तो अचेतन इतना सजग और संवेदनशील हो जाता है कि वह सामने वाले की सूक्ष्म बातें पकड़ लेता है। चेहरे का हल्का भाव, आँखों की नमी, हाथों की कँपकँपी, कपड़ों की स्थिति, ये सब संकेत उस व्यक्ति की मनोदशा का खाका खींच देते हैं।

दूसरा तत्व है सामूहिक अचेतन और गाँव की नब्ज। गाँव छोटा होता है, सब एक-दूसरे की परेशानी, बीमारी, पारिवारिक झगड़े किसी न किसी रूप में जानते हैं।

 सवारी वाला व्यक्ति भी उसी समाज का हिस्सा है। उसका अचेतन मन सबकी समस्या का एक सामान्य ढाँचा पहले से जानता है। जब वह बोलता है, "तेरे घर में स्त्री परेशान है", "पूरब दिशा में कोई दोष है", "पीपल के पास कुछ अटका है", तो ऐसी बातें सुनकर लगभग हर किसी को अपनी ज़िंदगी में कोई न कोई घटना मिल ही जाती है। मनोविज्ञान इसे बर्नम प्रभाव कहता है, जहाँ सामान्य से दिखने वाले कथन हमें अपने ऊपर एकदम सटीक लगते हैं।

और तीसरा तत्व, जो थोड़ा और भीतर ले जाता है, वह है वास्तविक सूक्ष्म ऊर्जा का संचार। क्वांटम फिजिक्स और परामनोविज्ञान इस संभावना को स्वीकारते हैं कि गहरी शांत अवस्था में हमारा मस्तिष्क एक तरह का ग्राहक यंत्र बन जाता है जो दूसरों की भावनात्मक और मानसिक तरंगों को पकड़ सकता है। इसी के साथ एक और संभावना जोड़िए जो कभी-कभी घटती है। 

सूक्ष्म जगत की कुछ शक्तियाँ, चाहे उन्हें हम पितर कहें, देव कहें या और कुछ, वे अपनी बात कहने के लिए किसी तैयार शरीर को एक यंत्र की तरह इस्तेमाल कर लेती हैं।

 जैसे रेडियो तरंगों को पकड़ने के लिए एक उपयुक्त यंत्र चाहिए, वैसे ही उन शक्तियों को अभिव्यक्त होने के लिए एक ऐसा शरीर चाहिए जो ट्रान्स में हो, जिसका चेतन मन शांत हो और जो ग्रहणशील हो। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि चेतना की वह गहराई है जहाँ सूचना का आदान-प्रदान शब्दों के बिना भी संभव है। बस फ़र्क इतना है कि यह घटना कभी-कभी ही होती है, हर बार नहीं। इसी को धार्मिक भाषा में लोग देवता का प्रकट होकर बताना कह देते हैं।

अब बात करते हैं कि आखिर देवी-देवता वैज्ञानिक दृष्टि से क्या हैं। भारतीय योग और तंत्र का विज्ञान इस रहस्य को बहुत साफ खोलता है। देवी-देवता कोई बाहर आसमान में बैठे अलग से जीव नहीं हैं, बल्कि ये इस ब्रह्मांड की मूल ऊर्जाओं और हमारे अपने मन की अलग-अलग शक्तियों के प्रतीक हैं।

• हमारे मस्तिष्क में अनंत क्षमताएँ हैं, लेकिन वे बिखरी हुई हैं।
• पीढ़ियों से किसी देवता की कल्पना करते-करते अचेतन में उसकी एक मजबूत और स्पष्ट छवि बन जाती है।
• यह छवि एक मनोवैज्ञानिक ऊर्जा-केंद्र बन जाती है, जिसे मनोविज्ञान आदिरूप (Archetype) कहता है।

उदाहरण के लिए काली माँ को ही ले लीजिए। वे समय की ऊर्जा का प्रतीक हैं, जो निर्ममता से सब पुराने, गंदे और बेकार को नष्ट कर नया जीवन देती है। गाँव में किसी पर काली की सवारी आने का अर्थ है कि उस व्यक्ति के भीतर की आक्रामक, रक्षक और बिना लाग-लपेट के सच बोलने वाली स्त्री ऊर्जा जाग गई है। वह अब सामने वाले की सच्चाई बिना किसी डर या मोह के बोल रही है।

ठीक इसी तरह हनुमान जी प्राणवायु और अटूट भक्ति-बल के प्रतीक हैं। जब किसी पर हनुमान जी की सवारी आती है, तो दरअसल उस व्यक्ति का अपना डर खत्म हो गया और उसके भीतर की अपार शारीरिक-मानसिक शक्ति प्रकट हो गई। 

"शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" का यही भाव है, पहले स्वयं शिव बनो, तब शिव की पूजा करो। अर्थात जिस देवता की सवारी आती है, वह कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि उसी देवता की पहले से विद्यमान संभावना का भीतर जाग्रत हो जाना है।

इस पूरे अनुभव का सार यह है कि यह सब मानव मस्तिष्क की एक शक्तिशाली लेकिन स्वाभाविक प्रक्रिया है। वर्षों की परंपरा, आस्था और सामूहिक विश्वास ने इसे एक दिव्य और चमत्कारिक रूप दे दिया है, जो अपनी जगह श्रद्धा का विषय है। लेकिन भीतर जाकर देखें तो यह मनोविज्ञान, स्नायुविज्ञान और चेतना के उस अद्भुत विज्ञान का खेल है जहाँ हमारा अचेतन मन जागता है, सूक्ष्म संकेतों को पकड़ता है, और हमारी ही भीतर की शक्ति किसी देवता के रूप में प्रकट हो जाती है। इसे न तो पूरी तरह जादू समझकर अंधविश्वास में बदलना चाहिए, और न ही बिना समझे पूरी तरह पाखंड करार दे देना चाहिए। यह मानवीय चेतना का एक अनसुलझा और विस्मयकारी क्षेत्र है।

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