अदण्ड्यश्चैव दण्ड्यश्च दण्ड्योऽपि च यथाक्रमम् ।
दण्डे दण्ड्ये च विज्ञेयं न्यायतोऽन्यायतोऽपि वा॥
यानी कुछ लोग दंड के योग्य नहीं होते, कुछ योग्य होते हैं, और कुछ विशेष रूप से दंडनीय होते हैं; इस सबका निर्णय न्यायपूर्वक करना चाहिए।
कभी मनुस्मृति के इस श्लोक की तुलना चर्च के उस सिद्धांत से कीजिए कि Error non habet ius" (गलती या भटकाव को कोई अधिकार नहीं होता)। चर्च का मानना था कि एक गलत विचार को जिंदा छोड़ना हज़ारों लोगों को नर्क भेजने जैसा है, इसलिए अपराधी को खत्म करना 'करुणा' का काम है। जैसे राजा के खिलाफ विद्रोह करने पर मौत मिलती थी, वैसे ही गॉड के नियमों (Dogma) को चुनौती देना "दिव्य राजद्रोह" माना जाता था, जिसके लिए सबसे कठोर सजा अनिवार्य थी। चर्च का मानना था कि ईशनिंदा एक संक्रामक रोग (Gangrene) की तरह है। अगर एक अंग (अपराधी ) को नहीं काटा गया, तो वह पूरे समाज की आत्मा को नर्क ले जाएगा। शरीर को जलाना नर्क की आग का पृथ्वी पर पूर्वाभ्यास माना जाता था ताकि शायद मरने वाला आखिरी पल में पश्चाताप कर ले।
मनुस्मृति में देवनिन्दा (देवताओं/ईश्वर की निंदा) के लिए कोई विशिष्ट “राजकीय दंड” (जैसे जुर्माना या शारीरिक सजा) का सीधा प्रावधान नहीं है। यह मुख्य रूप से धार्मिक/नैतिक पाप (pāpa) माना गया है, जिसके परिणाम कर्मफल, नरक या सामाजिक/आध्यात्मिक हानि के रूप में बताए गए हैं। मनुस्मृति 4.163 कहती है कि: नास्तिक्यं वेदनिन्दा च देवतानां च कुत्सनम् ॥ द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत् ॥ यानी नास्तिकता, वेदों की निंदा, देवताओं की निंदा (कुत्सन), द्वेष, दंभ आदि से बचना चाहिए।यहाँ देवनिन्दा को नैतिक रूप से वर्जित बताया गया, लेकिन कोई दंड निर्दिष्ट नहीं किया गया।
जबकि चर्च के इतिहास से इस अपराध के लिए दंडों के वास्तव में घटे उदाहरण लूँ तो मन में खौफ पैदा हो जाता है। मैं आगे जब जब भी अपराध का नाम लूँ तो वह अपराध यही है।
मसलन जीवित जलाना (Burning at the Stake) चर्च की सबसे मानक सजा थी। जियोर्डानो ब्रूनो और जान हस को चर्च के आदेश पर इसी तरह खत्म किया गया ताकि उनका शरीर (Relic) न बचे। जॉन हस का अपराध यह था कि उसने कहा चर्च का असली मुखिया ईसा मसीह हैं, न कि पोप अहिंसा का नाटक" (Ecclesia abhorret a sanguine) यहां था। चर्च का नियम था कि वह "खून नहीं बहा सकता"। इसलिए जलाने की सजा चुनी गई क्योंकि इसमें खून नहीं बहता था और शरीर पूरी तरह खत्म हो जाता था। मारिया बारबरा कार्लो (Maria Barbara Carillo, 1721) को 95 वर्ष की आयु में जिंदा जला दिया गया (वह स्पेनिश इनक्विजिशन द्वारा जलाई गई सबसे बुजुर्ग व्यक्तियों में से एक थीं)।उन पर "जुडाइजिंग" (ईसाई होने के बावजूद यहूदी रीति-रिवाजों का पालन करना) का आरोप था। मार्गेरिट पोरटे (Marguerite Porete, 1310) अपनी रहस्यमयी किताब के साथ पेरिस में जिंदा जला दी गईं। उन्होंने 'द मिरर ऑफ सिंपल सोल्स' लिखी थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि एक पूर्ण आत्मा को चर्च के नियमों की आवश्यकता नहीं होती।
स्ट्रैपाडो (Strappado) में अपराधी के हाथ पीछे बांधकर उसे ऊपर लटकाया जाता था और फिर झटके से नीचे गिराया जाता था। इससे कंधे के जोड़ पूरी तरह उखड़ जाते थे।
द रैक (The Rack) पर चढ़ाये जाने की सज़ा ऐन एस्क्यू को मिली थी । बेलन (Rollers) की मदद से शरीर को तब तक खींचा जाता था जब तक कि नसें और जोड़ फट न जाएं। एन एस्क्यू का अपराध यह था कि उन्होंने 'ट्रांसबस्टैंशिएशन' (Transubstantiation) से इनकार किया—यानी उन्होंने यह मानने से मना कर दिया कि चर्च की रोटी सच में मसीह का मांस बन जाती है।
मरणोपरांत मुकदमा (Posthumous Trial) भी चलता था। चर्च ने जॉन वाइक्लिफ की मौत के 44 साल बाद उनकी कब्र खुदवाई, उनकी हड्डियों पर मुकदमा चलाया और फिर उन्हें जलाकर राख को नदी में फेंक दिया। पिएत्रो डी अबानो (Pietro d'Abano, 1316) की
मुकदमे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, तो चर्च ने उनकी लाश को खोदकर निकाला और सार्वजनिक रूप से जलाया।
जिह्वा छेदन (Piercing the Tongue) भी हुआ। जो लोग चर्च के खिलाफ बोलते थे, उनकी जीभ में लोहे की कील ठोक दी जाती थी या उसे काट दिया जाता था ताकि वे 'ईशनिंदा' न कर सकें। ब्रूनो वैज्ञानिक ने तर्क दिया था कि ब्रह्मांड अनंत है और कई अन्य संसार भी हो सकते हैं, जो चर्च की 'धरती ही केंद्र है' वाली बात के खिलाफ था। उन्हें लोहे की कील जीभ में ठोककर जिंदा जलाया गया (1600) था।
हेरेटिक फोर्क (The Heretic's Fork) एक दोमुंहा कांटा था जो गले और छाती के बीच बांध दिया जाता था। गर्दन जरा भी झुकने पर वह गले को चीर देता था। यह सोने न देने की एक यातना थी।
दीवार में चुनवाना (Immurement) सिर्फ मुगलों तक सीमित न था। कई अपराधियों को ताउम्र के लिए चर्च की कालकोठरी की दीवारों के पीछे बंद कर दिया जाता था, जहाँ उन्हें बस एक छोटे छेद से खाना मिलता था।
पीला क्रॉस पहनना (The Yellow Cross) भी एक सज़ा थी। पश्चाताप' करने वाले अपराधियों को उम्र भर अपने कपड़ों पर बड़े पीले क्रॉस सिलकर घूमने पड़ते थे ताकि समाज उनका बहिष्कार करे।
लोहे का अस्त्र (Iron Maiden) से भी सजा मिलती थी। इनक्विजिशन के संग्रहालयों में इसे एक डरावने यंत्र के रूप में दिखाया जाता है, जिसमें अंदर की तरफ कीलें होती थीं।
जूडस क्रेडल (Judas Cradle) की सजा और क्रूर थी। संदिग्ध अपराधी को रस्सियों से एक नुकीले पिरामिड पर धीरे-धीरे उतारा जाता था ताकि वह उसे अंदर से फाड़ दे।
गला घोंटना और जलाना (Garrote) की सजा भी थी। विलियम टिंडेल जैसे लोगों को पहले लोहे के तार से गला घोंटकर मारा गया, फिर उनके शव को जलाया गया।
संपत्ति की जब्ती (Confiscation) भी की जाती थी। किसी को अपराधी घोषित करते ही चर्च उसकी सारी जमीन और धन छीन लेता था, जिससे उसका परिवार सड़कों पर आ जाता था।
सार्वजनिक कोड़े मारना (Public Scourging) भी था। कम अपराध वाले अपराधियों को हर रविवार चर्च के दरवाजे पर नग्न कर कोड़े मारे जाते थे।
पुनः बपतिस्मा पर मृत्युदंड मिलता था। एनाबैप्टिस्ट' (Anabaptists) जो चर्च के बाल-बपतिस्मा को नहीं मानते थे, उन्हें 'तीसरा बपतिस्मा' देने के नाम पर नदी में डुबोकर मार दिया जाता था।
लोहे के जूते (Iron Boots) वाली सजा और क्रूर थी। इसमें पैरों को लोहे के जूतों में डालकर उन्हें गर्म किया जाता था या कीलों से कस दिया जाता था जिससे हड्डियाँ चकनाचूर हो जाती थीं।
घुटने तोड़ना (Knee Splitter) भी सज़ा का एक प्रकार था। एक औजार से घुटने की कटोरी और जोड़ों को तब तक दबाया जाता था जब तक वे हमेशा के लिए बेकार न हो जाएं।
वाटर टॉर्चर (Toca) में आरोपी के मुंह में कपड़ा ठूंसकर ऊपर से पानी डाला जाता था ताकि उसे डूबने और दम घुटने का एहसास हो (आज का वॉटरबोर्डिंग)।
कैथर्स का नरसंहार (Albigensian Crusade) करने हेतु चर्च ने पूरे के पूरे 'कैथर' समुदाय को खत्म करने के लिए सेना भेजी और हजारों लोगों को एक साथ जला दिया गया।
अंगूठे दबाना (Thumb Screws) तो सस्ती सजा थी। इसमें लेखकों और विचारकों के अंगूठों को लोहे के शिकंजे में कसकर कुचल दिया जाता था ताकि वे दोबारा न लिख सकें।हमारे यहाँ के एकलव्य की तो बड़ी चर्चा मिश न रि यों ने की करवाई, अपनी इस सज़ा के बारे में बतलाने में चूक गये।
ऑटो-डा-फे (Auto-da-fé) की चर्चा मैंने पिछली एक पोस्ट में की थी। यह एक सार्वजनिक उत्सव जैसा होता था जहाँ सैकड़ों अपराधियों को एक साथ जुलूस में ले जाकर सामूहिक रूप से जलाया जाता था।
ह्युजेस एम्ब्रायट (Hugues Aubriot, 1381) को मिली सजा ‘मुरस स्ट्रेक्टस' (Murus Strictus) यानी जीवन भर के लिए अंधेरी कालकोठरी में केवल रोटी और पानी पर रखा जाना। उस पर यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखने और चर्च के नियमों की अवहेलना करने का आरोप था।
फ्रा डोलसिनो (Fra Dolcino, 1307) ने एक क्रांतिकारी पंथ चलाया था जो चर्च की अमीरी के खिलाफ था। उन्हें गरम चिमटों से धीरे-धीरे नोंचकर मारा गया और फिर उनके शरीर के अंगों को जला दिया गया।
सर्वेंटस जैसे रक्त संचार वैज्ञानिक को मारने में जल्लादों ने जानबूझकर गीली लकड़ी (Green oak wood) का उपयोग किया था। गीली लकड़ी धीरे जलती है और बहुत धुआं पैदा करती है, जिससे आग की लपटें धीमी रहती हैं। इसका उद्देश्य मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा खींचना था ताकि अपराधी अधिक समय तक तड़पे। उसके सिर पर तिनकों का एक मुकुट रखा गया था जिस पर सल्फर (गंधक) छिड़का गया था। जब आग की लपटें ऊपर पहुँचीं, तो सल्फर ने भीषण गर्मी पैदा की जिससे उसका सिर जलने लगा, लेकिन वह तुरंत मरा नहीं।जहाँ सामान्य तौर पर सूखी लकड़ी से व्यक्ति कुछ ही मिनटों में दम घुटने या जलने से मर जाता था, सर्वेंटस को मरने में 30 मिनट से लेकर लगभग 2 घंटे तक का समय लगा। वह पूरी प्रक्रिया के दौरान होश में था और दया की भीख मांगता रहा। उसकी प्रसिद्ध किताब 'Christianismi Restitutio' (जिसके कारण उसे अपराधी माना गया था) को उसकी जांघ से बांध दिया गया था ताकि वह भी उसके साथ भस्म हो जाए। सर्वेंटस पश्चिमी दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह बताया कि रक्त (Blood) हृदय के दाहिने हिस्से से फेफड़ों (Lungs) में जाता है, वहां ऑक्सीजन लेकर शुद्ध होता है, और फिर वापस हृदय के बाएं हिस्से में आता है। उनसे पहले यह माना जाता था कि रक्त हृदय के बीच की एक दीवार से होकर सीधे गुजरता है। उस समय चर्च का मानना था कि "आत्मा" (Soul) रक्त में निवास करती है। सर्वेंटस का यह कहना कि रक्त फेफड़ों में हवा से मिलने जाता है, चर्च को ऐसा लगा जैसे वह आत्मा के दैवीय रहस्य को एक भौतिक या मैकेनिकल प्रक्रिया बता रहे हैं।
ल्यसिलो वानिनी को उनकी पुस्तकों Amphitheatrum Aeternae Providentiae Divino-Magique ( ईश्वरीय और जादुई शाश्वत विधान का रंगमंच) और De Admirandis Naturae Reginae Deaeque Mortalium Arcanis(मृत्युलोक की रानी और देवी प्रकृति के अद्भुत रहस्यों पर) के लिए लकड़ी के एक फ्रेम से चर्च तक घसीट कर लाया गया। फिर उसकी शर्ट फाड़ी गई, फिर उसे एक जलती मशाल पकड़ाई गई, उसकी जीभ काटी गई, उसका गला घोंटा गया और उसे जला दिया गया।
इस्लामी दंड विधान का भी पुराना इतिहास रहा। का'ब इब्न अल-अशरफ (624 ईस्वी): एक कवि था जिसने मदीना में पैगंबर और मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक कविताएं लिखीं। उसे मौत की सजा दी गई।
असमा बिंत मरवान (624 ईस्वी) को पैगंबर मोहम्मद की आलोचना करने और कबीलों को भड़काने के आरोप में दंडित किया गया।अबू अफक (624 ईस्वी) एक वृद्ध कवि था जिसे पैगंबर के अपमान के आरोप में मार दिया गया।
जाद इब्न दिरहम (742 ईस्वी) उमेय्यद काल का एक विद्वान था जिसने कुरान के नाजिल होने पर बहस की। उसे ईद-उल-अजहा के दिन सार्वजनिक रूप से वध किया गया।बशर अल-मरीसी (9वीं सदी) एक मुअतज़िला विद्वान था जिसे अब्बासिद काल में कट्टरपंथियों ने ईशनिंदा के आरोप में प्रताड़ित किया।मंसूर अल-हल्लाज (922 ईस्वी) सबसे प्रसिद्ध सूफी शहीद हुए। उन्होंने "अनल हक" (मैं ही सत्य हूँ) कहा था। उन्हें पहले सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे गए, फिर उनके हाथ-पैर काटे गए और अंत में फांसी देकर उनके शरीर को जला दिया गया। इमाद अल-दीन नसिमी (1417 ईस्वी) सूफी कवि था जिस पर ईशनिंदा का आरोप लगा और अलेप्पो (सीरिया) के बाजार में उनकी जिंदा खाल उतार दी गई (Flaying alive)। ऐन अल-कुज़ात हमदानी (1131 ईस्वी)को हमदान की जेल में गला घोंटकर मारा गया और फिर उनके शव को चटाई में लपेटकर खौलते हुए तेल में डाल दिया गया।
परफेक्टस (850 ईस्वी) कोर्डोबा का एक पादरी था जिसने पैगंबर के बारे में अपमानजनक शब्द कहे थे। उसे सिर काटकर मौत की सजा दी गई। इसाक ऑफ कोर्डोबा (851 ईस्वी) एक ईसाई भिक्षु था जिसने सार्वजनिक रूप से इस्लाम की आलोचना की। उसे फांसी दी गई। फ्लोरा और मारिया (851 ईस्वी) दो ईसाई महिलाएं थीं जिन्हें ईशनिंदा और इस्लाम छोड़ने के लिए मृत्युदंड दिया गया। यूलागियस (859 ईस्वी) कोर्डोबा के 'शहीद' आंदोलन के नेता थे। उन्हें ईसाइयों को ईशनिंदा के लिए उकसाने के आरोप में सिर काटकर मार दिया गया। जाद इब्न दिरहम (742 ईस्वी) को उमेय्यद गवर्नर खालिद अल-कसरी ने ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद मिंबर के नीचे भेड़ की तरह ज़बह (गला काटना) कर दिया। शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1191 ईस्वी) को अलेप्पो के किले में तब तक भूखा रखा गया जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई। बशर अल-हफी के अनुयायियों को ऊंची मीनारों से नीचे फेंककर मारा गया था। इब्न मुक़फ़्फ़ा (756 ईस्वी) एक प्रसिद्ध लेखक थे जिस पर ईशनिंदा का आरोप लगा। उसे भट्टी के पास ले जाया गया और उसके शरीर के अंगों को एक-एक करके काट कर उसी के सामने आग में भून दिया गया।मैं भारतीय उदाहरण देना नहीं चाह रहा था पर फिरोज शाह तुगलक के काल में एक ब्राह्मण को यह कहने पर कि 'इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों सच्चे हैं', चर्च की तरह लकड़ियों के ढेर पर जिंदा जला दिया गया। 18वीं-19वीं सदी में दरगाहों पर जाने या 'बिदत' (नवाचार) को ईशनिंदा मानकर सार्वजनिक रूप से कोड़े मारना और सिर काटना आम था।
ये सब नाम मात्र के उदाहरण हैं वरना ऐसी सजाओं को भुगतने का इतिहास लाखों लोगों का है।
मनु का दंड विधान इस पर एकदम मौन है। मनुस्मृति में सीधा उल्लेख न होने पर भी प्राचीन भारतीय व्यवस्था में देवनिन्दा को वाक्पारुष्य (मौखिक अपमान) की श्रेणी में देखा जाता था। याज्ञवल्क्य स्मृति (2.211) देवताओं, राजा या त्रिवेदी ब्राह्मण की निंदा पर उत्तम साहस दंड (भारी जुर्माना — लगभग 500-1000 पण या अधिक, शास्त्र अनुसार) का प्रस्ताव करती है। कौटिल्य अर्थशास्त्र (3.18.12) में देवताओं या चैत्य की निंदा पर उत्तम साहस दंड(500-1000 पण का जुर्माना) था। यह जुर्माना राजा द्वारा लगाया जाता था, लेकिन शारीरिक सजा (जैसे अंग-भंग) नहीं थी। मुख्यतः आर्थिक दंड था। चार्वाक, बौद्ध, जैन, आजीवक — ये सब वैदिक विरोधी थे। फिर भी इनके अनुयायियों को राज्य-दण्ड नहीं मिला। आधुनिक उदारवादी लोकतन्त्र, UN का Article 18 (UDHR), John Stuart Mill का “On Liberty” — सब यही कहते हैं कि विचार और अन्तःकरण की स्वतन्त्रता राज्य-दण्ड से परे होनी चाहिए।इस मानदण्ड पर मनुस्मृति की परम्परा — और व्यापक हिन्दू परम्परा — Inquisition और apostasy-law से निःसन्देह श्रेष्ठतर रही। चार्वाक ने ईश्वर को नकारा — जीवित रहे। बृहस्पति ने वेदों को “धूर्त-प्रपञ्च” कहा — उनके विचार संरक्षित रहे। बौद्धों ने आत्मा को नकारा — सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया। यह intellectual tolerance वास्तविक और ऐतिहासिक है।अजितकेशकंबली, संजय बेलठिपुत्त, पकुद्ध कात्यायन जैसे कितने ही वेदनिंदक हुए, किसी को कुछ नहीं हुआ। ‘न परमेश्वरोऽपिकश्चित्’ कहने वाले को भी कुछ नहीं हुआ और ‘काम एवैक: पुरुषार्थ:’ कहने वाले को भी छेड़ा नहीं गया। ‘प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्’ कहने वाले का किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा।
पर इसके दुष्परिणाम भी हुए। आज नव-बौद्धों सहित बहुत से प्रतिद्वंद्वी रिलीजन मनु के द्वारा दिखाई गई उदारता का भारत में दुरुपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं ।
फिर भी मनु की ओर दुनिया क्रमशः बढ़ रही है। 21वीं सदी में न्यूजीलैंड (2019), कनाडा, आइसलैंड, आयरलैंड, माल्टा, नॉर्वे और स्कॉटलैंड जैसे देशों ने अपने ईशनिंदा कानूनों को पूरी तरह से हटा दिया है। प्यू रिसर्च सेंटर' (Pew Research Center) के अनुसार, 2019 तक दुनिया के लगभग 79 देशों (करीब 40%) में ईशनिंदा के खिलाफ कानून मौजूद थे। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में स्थिति सबसे सख्त है, जहाँ लगभग 90% देशों में ऐसे कानून लागू हैं।
मनुस्मृति और तत्जनित भारतीय औदार्य की आधुनिकता देखकर आश्चर्य होता है।
मनोज श्रीवास्तव
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