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Tuesday, 28 April 2026

(आर्यसमाज का अ वैदिक विवाह ) - कहानी

(आर्यसमाज का अ वैदिक विवाह ) - कहानी

बाबूलाल आर्य, गाँव के सबसे कट्टर आर्यसमाजी थे। 55 वर्ष की आयु थी, दुबले पतले थे, नाटा कद था। चेहरे के अधिकांश भाग पर बड़ी मूछों का कब्जा था, लेकिन खोपड़ी ऐसी सपाट जैसे वहाँ कभी कोई बाल जैसी वस्तु न रही हो। फिर चेहरे की बनावट ऐसी थी कि दुखी भी हों तो मुस्कुराते जान पड़ते। पिचके, लटके हुये गालो को एक विशेष कौशल से हिलाते हुये जब - 'वेदों की ओर लौटो' बोलकर दो बार भौंहें ऊपर-नीचे करते तो मुखाकृति ऐसी हो जाती कि मरा हुआ आदमी भी हँस पड़े। हालाँकि अज्ञात कारणो से वे स्वयं वेद न पढ़ पाए थे, किंतु संसार भर को वेद पढ़ाना चाहते थे। 'यह बात वेदविरुद्ध है', 'यह प्रक्षिप्त है' आदि उनके तकियाकलाम थे। दिन में जब तक चार जगह मूर्ति पूजा को पाखंड है, ईश्वर अवतार नहीं लेता, दयानन्द सा ऋषि कभी न हुआ - आदि बोलकर किसी से जिरह न कर लेते, उनका भोजन न पचता। गाँव के गिने-चुने चार-पाँच दयानंद भक्तों में वे प्रथम स्थान रखते थे। उनका नियम था सोने से पूर्व प्रतिदिन ही दयानंद स्वामी की पुस्तकों को बड़े चाव से पढ़ते हुए सोते और मीठे सपनों में खो जाया करते।

एक दिन रात्रि में सोने से पूर्व, दयानंद कृत भाष्यभूमिका पढ़ रहे थे, जिसमें लिखा था – "जलरूप जो मेघ हैं, वह पिता हैं एवं पृथ्वी उसकी कन्या हैं, क्योंकि पृथ्वी की उत्पत्ति जल से ही है। तो जब जल (पिता), वृष्टि द्वारा पृथ्वी (अपनी पुत्री) में वीर्य स्थापन करता है, तब पृथ्वी (पुत्री के) गर्भ से औषधि आदि अनेक पुत्र उत्पन्न होते हैं" (दयानंद, भाष्य भूमिका पृष्ठ – २२६)।

'पिता जी, लीजिए दूध पी लीजिए' – बाबूलाल की 17 वर्षीय कन्या ने दूध का गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा।

बाबूलाल ने सपकपाते हुए भाष्य भूमिका को बिजली की सी फुर्ती से बंद किया, गिलास हाथ में लेते हुए पुत्री को ध्यान से देखा।

विचार करने लगे – कन्या विवाह योग्य हो गई है, अब कोई अच्छा खानदानी आर्यसमाजी परिवार देखकर इसका विवाह कर देना चाहिए।

बाबूलाल खोज में लगे। थोड़ी मशक्कत के बाद ही उन्होंने पीढ़ियों से आर्यसमाजी रहे, 'अपनी ही जाति के' एक परिवार को खोज निकाला। हालाँकि वे प्रकट तौर पर जाति व्यवस्था के घोर आलोचक थे, लेकिन चूँकि उनके माता-पिता, दादा आदि सब पूर्वज उनके अनुसार पौराणिक थे – और दुष्ट पौराणिकों के संस्कार इतनी सहजता से कहाँ छूटते हैं?

विवाह कराने हेतु पंडित की खोज करना बड़ी टेढ़ी खीर साबित हो रहा था, क्योंकि गाँव में कोई आर्यसमाजी पंडित न था। विवश होकर सकुचाते हुए बाबूलाल गाँव के बाहर स्थित एक आचार्य के आश्रम में पहुँचे।

बाबूलाल को प्रत्यक्ष सम्मुख देख, अपनी हँसी को बलात् दबाते हुए आचार्य बोले – "आइए बाबूलाल, आज यहाँ कैसे, सब कुशल तो है न?"

"जी ईश्वर की कृपा से सब मंगल ही मंगल है। कन्या का विवाह निश्चित हुआ है। विवाह पढ़ने हेतु पंडित जी की व्यवस्था कीजिए, किंतु मेरी इच्छा है कि यह विवाह पूर्णत: आर्यसमाजी विधि से, स्वामी दयानंद की संस्कार विधि से ही पूर्ण कराया जाए। आप कोई सहायता करें, बड़ी कृपा होगी।"

आचार्य अपनी हँसी न रोक सके, हँसते हुए बोले – "क्यों नहीं? मेरा एक शिष्य है शचींद्र। आर्यसमाज के संस्कारों से पूर्णत: परिचित है, दयानंद की एक-एक पुस्तक को मानो घोंटकर पी गया है। वह अवश्य ही पूरी आर्यसमाजी विधि से विवाह संपन्न करा देगा।"

"शचींद्र, ज़रा इधर आना तो" – गुरुदेव ने मुझे आवाज़ लगाई। मैं, जो कि वृक्ष की ओट में खड़ा होकर पूरे वार्तालाप को सुन रहा था, किंतु गुरुदेव के बुलाने पर, थोड़ा दूर हटते हुए, अनभिज्ञ की भाँति सम्मुख आ खड़ा हुआ।

गुरुदेव मुस्कुराते हुए बोले – "सुनो वत्स मंदबुद्धि, बाबूलाल जी की कन्या का विवाह है। बाबूलाल जी से वैचारिक मतभेद होते हुए भी हमारी मित्रता है। अतः नीति और न्याय के अनुसार, ऐसे अवसर पर हमें इनकी सहायता करनी चाहिए। तुम इनकी कन्या का विवाह स्वामी दयानंद जी द्वारा संस्कार विधि के अनुसार पढ़ते हुए, पूरे आर्यसमाजी विधि-विधान से कराना। ज़रा भी कसर बाकी नहीं रहनी चाहिए।"

मैंने हाथ जोड़कर गुरुदेव की आज्ञा को सहर्ष शिरोधार्य करने की अनिवार्य स्वीकृति के रूप में शीश झुकाकर प्रणाम किया। बाबूलाल भी 'जय हो' बोलकर अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में घर की ओर लौट गए।

2
विवाह मंडप में बड़ा कोलाहल उठ खड़ा हुआ। उपस्थित सभी रिश्तेदार मुझे घेरकर खड़े थे और कड़े शब्दों में भर्त्सना कर रहे थे।

वधू की माता बड़बड़ा रही थी – "अरे, यह कैसा दुष्ट पंडित खोज कर लाए हो? मुझसे और कन्या से गंदे-गंदे प्रश्न पूछ रहा है। ऐसा पंडित तो कभी न देखा!"

बाबूलाल ने कहा – "क्यों जी, क्या पूछते हो?"

मैंने कहा – "मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं पूछा। संस्कार विधि में स्वामी दयानंद ने ही – 'जब कन्या रजस्वला होकर शुद्ध हो जाए, तो पाँचवे दिन से लेकर जिस दिन गर्भाधान (सुहागरात + संतान प्राप्ति हेतु संभोग) की रात्रि निश्चित की हो, उस रात्रि में विवाह करने का आदेश किया है' (संस्कार विधि पृष्ठ १०६)।

सत्यार्थ प्रकाश में भी स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है कि – 'जब मासिक धर्म के बाद कन्या चतुर्दिक स्नान करके शुद्ध हो जाए तो पाँचवे दिन से लेकर सोलहवें दिन तक, जब कन्या को संयोग (संभोग) की और पुत्र की इच्छा हो, तब रात्रि के एक घंटा बीतने पर विवाह संस्कार शुरू करना चाहिए।' अतः मैंने तो बस स्वामी जी द्वारा कही विधि की पूर्णता हेतु ही प्रश्न पूछा है कि – 'अब से पाँच दिन पूर्व उसके मासिक धर्म प्रारंभ होकर आज समाप्त हो गए हैं न?' 

दूसरा प्रश्न मैंने पूछा है कि – 'ये अब तक कुल 36 बार रजस्वला हो चुकी है या नहीं?' क्योंकि स्वामी जी ने कहा है कि – 'यदि प्रतिमास रजोदर्शन (मासिक धर्म) होता है तो तीन वर्षों में कुल 36 बार रजस्वला हुए पश्चात विवाह करना योग्य है, इससे पूर्व नहीं' (सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ ७४। अतः मैं तो स्वामी जी के किए विधान की ही परीक्षा कर रहा हूँ, मेरा क्या दोष?"

बाबूलाल मौन हो गए। उनकी श्रीमती बोली – "अरे स्वामी जी सन्यासी थे, उन्हें इन सब बातों का क्या ज्ञान? विवाह की तिथि तो काफी समय पहले ही निश्चित हो जाती है। अब यह मासिक धर्म की तिथि तो कन्या के हाथ में नहीं, यह तो प्रकृति-प्रेरक है। कई बार तीन-चार दिन का अंतर पड़ जाता है तो कभी अधिक। अतः इस तरह कहीं विवाह होना संभव ही नहीं। और 36 बार हुई या 50 बार, इसके लिए कोई रजिस्टर थोड़े ही बनाता है। स्वामी जी को इन सब महिलाओं की बातों का ज्ञान नहीं होगा। आप इसे छोड़िए।"

मैंने यह सुनकर सहमति व्यक्त करते हुए बाबूलाल जी की ओर देखा, वे अब भी मौन ही थे।

मैंने कहा – "यह तो सीधे-सीधे स्वामी जी की बताई विधि में अतिक्रमण है। फिर तो आपने स्वामी जी द्वारा सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में कहा गया – 'अपने मन चाहे वर से गुप्त व्यवहार लिखकर पूछ ले' – उस विधि का भी पालन न किया होगा? गुप्त-व्यवहार, अर्थात वर को शीघ्रपतन आदि का दोष तो नहीं है, और वर भी पूछ ले, कन्या कहीं अपना शील..."

बाबूलाल बीच में उत्तेजित होकर बोल उठे – "अरे, कैसी लज्जाजनक बात करते हो! तुम इस बात को छोड़ते क्यों नहीं? विवाह विधि को आगे बढ़ाओ।"

मैंने कहा – "ठीक है। स्वामी जी की इस बात को भी आप नहीं मानते तो जाने दीजिए। किंतु स्वामी जी जो कह गए हैं कि 'स्त्री की आयु से वर की आयु कम से कम डेढ़ गुणी और अधिक से अधिक दूनी होवे' (संस्कार विधि, पृष्ठ संख्या ९६) – आपके वर की आयु कन्या से डेढ़ गुणी से दो गुणी तक है न?"

बाबूलाल ने संभवतः मन में गुणा-भाग किया और चुप रह गए।

मैंने कहा – "ओहो! तो यहाँ भी स्वामी जी की विधि को खंडित कर दिया आपने। चलिए, इसे भी छोड़ते हैं। अब यह देखिए – कन्या का सिर, पुरुष के कंधे तक आता है या नहीं?"

वधू की माता बोली – "अरे, हर कन्या का सिर वर के कंधे तक थोड़े ही आता है? इससे आपको क्या लेना-देना?"

मैंने कहा – "वाह-वाह! लेना-देना क्यों नहीं है? विवाह स्वामी दयानंद की विधि से हो, इसका दायित्व है मुझ पर। स्वामी जी ने कहा है – 'वर के शरीर से स्त्री का शरीर पतला और पुरुष के कंधे के समान स्त्री का सिर होना चाहिए' (स.वि. पृ. १०५ )। किंतु देखने में आ रहा है, आपने यहाँ भी संस्कार विधि से विरोध किया। आपकी कन्या की लंबाई वर के समान है, और कन्या वर से अधिक मोटी भी है। फिर तो यह बड़ी भारी वैदिक हानि हो गई।"

बाबूलाल बोले – "अरे, अब सब कुछ का पालन नहीं हो पाता। आप इसे छोड़िए।"

मैंने कहा – "आप तो संस्कार विधि से पूर्ण आर्यसमाजी विवाह कराना चाहते थे, किंतु सब विषयों में विधि-व्यतिक्रम कर रहे हैं। चलिए, यह बताइए – आपकी कन्या ने दूसरे कमरे में गर्भाधान (संतान हेतु संभोग – सुहागरात) की सामग्री, और गर्भाधान के बाद किए जाने वाले स्नान और उसके बाद सोंठ, असगंध, कस्तूरी, जायफल, जावित्री और सालम मिश्री का मर्दाना जोश बढ़ाने वाला नुस्खा डालकर दूध तैयार रखा है न? क्योंकि आधी रात तक विवाह पूर्ण होते ही, इन्हें तुरंत सबके सामने से ही गर्भाधान का कर्म करने जाना है। 

क्योंकि ऐसा ही स्वामी दयानंद जी ने अपने मुख से फरमाया है कि – 'जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझे, उसी दिन संस्कार विधि के अनुसार सब विवाह कर्म करके, मध्यरात्रि या दस बजे अति प्रसन्नता से सबके सामने विवाह की विधि को पूरा करके, एकांत सेवन करे, और पुरुष द्वारा वीर्य स्थापन और स्त्री वीर्य का आकर्षण की जो विधि है, उसके अनुसार करे' (सत्यार्थ प्रकाश – पृष्ठ 81)।"

मंडप में उपस्थित महिलाएँ यह सुनकर 'हाय-हाय' करने लगीं, किंतु बाबूलाल का मुखमंडल इस कथन को सुनकर खिल उठा – "मेरी लड़की सत्यार्थ प्रकाश की परीक्षा देकर पास है, और इन कार्यों में ट्रेंड होने का सर्टिफिकेट ले चुकी है। मेरी लड़की ने सब तैयारी पूरी कर रखी होगी, किंतु आपको इससे क्या? आप इसे छोड़िए?"

मैंने कहा – "अरे बाबूलाल जी, ऐसे कैसे छोड़ दें? विवाह के आचार्यत्व के नाते यह सब समझाना हमारा कर्तव्य है। आपकी लड़की को समझ जाना चाहिए कि विवाह के फौरन बाद ही सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार वर इसमें गर्भ का आधान करेगा... अतः स्वामी जी द्वारा कही वैदिक विधि में त्रुटि न हो, इसलिए मैं उनका ही वचन यहाँ पहले पढ़ देता हूँ –

'जब वीर्य का गर्भ में गिरने का समय हो तो उस समय स्त्री और पुरुष दोनों स्थिर हो और नाक के सामने नाक, नेत्र के सामने नेत्र, अर्थात शरीर को सीधा करें और अत्यंत प्रसन्न रहें, डिगें नहीं। पुरुष अपने शरीर को ढीला छोड़े, और स्त्री उस वीर्य की प्राप्ति के समय अपान वायु को ऊपर खींचे, योनि को ऊपर संकोच (सिकोड़) कर वीर्य का ऊपर आकर्षण करके गर्भाशय में स्थित करे। तत्पश्चात दोनों शुद्ध जल से स्नान करें, और सालम मिश्री का नुस्खा दूध में डालकर पी लें और फिर अलग-अलग सो जाएँ' (सत्यार्थ प्रकाश – पृष्ठ ८२)।"

यह सुनकर कोलाहल बढ़ उठा। स्त्रियाँ 'राम-राम' कर उठीं और बाबूलाल आर्य गरम हो उठे और कटु वचन कहने लगे।

मैंने कहा – "मैं अपनी इच्छा से तो कुछ नहीं कह रहा, केवल स्वामी दयानंद जो विधि लिख गए हैं, उसे ही शब्दश: सुनाकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूँ। आप क्रोधित क्यों होते हैं? आपने ही तो कहा था विवाह स्वामी दयानंद के अनुसार होना चाहिए। मैं तो उसी का पालन कर रहा हूँ, पर आपने तो विधि ही भंग कर दी। चलिए, कोई नहीं, आगे बढ़ते हैं..."

कुछ विधि-विधान के उपरांत मैंने संस्कार विधि का मंत्र पढ़ा और उसे हिंदी में बोलते हुए वर से कहा – "आप अपनी पत्नी से कहिए –

'हे स्त्री, मैं तेरे उपस्थेन्द्रिय (योनि) को प्रेम से युक्त करता हूँ। संतान की उत्पत्ति का यह द्वितीय द्वार-रूप है। तू इसी के द्वारा वश में न होने वाले पुरुषों को भी नीचा दिखाती है। हे घर की स्वामिनी, तू 'सबको' वश में करने वाली है।... उसके साथ ही पुरुष के उपस्थेन्द्रिय (लिंग) से उत्पन्न, संतान के उत्पादन में समर्थ वीर्य को घी के समान कहा है। हे स्त्री, यह वीर्य तेरे शरीर में धारण होकर पुष्ट हो' (संस्कार विधि, पृष्ठ १२३)।"

बाबूलाल आर्य भड़क उठे। मैंने कहा – "इन मंत्रों को स्वामी जी ही संस्कार विधि में लिख गए हैं, और ये अर्थ भी मैंने नहीं किए, ये भी एक आर्यसमाजी का ही किया हुआ है। आप पढ़ते नहीं, मेरा क्या दोष है? चलिए, मैं आगे बढ़ता हूँ।"

बाबूलाल थोड़े नरम हुए। फिर मैंने थोड़ी विधि कराकर वर से कन्या के प्रति कहलवाया – "अघोरचक्षुरपतिध्न्या... वीरसूर्देवृकामा (संस्कार विधि. पृ. ११३) – अर्थ बोलो – 'हे स्त्री, तू देवर (मेरे भाई) की कामना करती हुई, अर्थात नियोग की भी इच्छा करने वाली होकर, सुखयुक्त हो।'"

बाबूलाल आर्य सुनते ही भड़क उठे – "अरे, तुम यह कैसी असभ्यता कर रहे हो? मेरी लड़की को खुलेआम व्यभिचारी बनने का उपदेश कर रहे हो? यह भला देवर की कामना क्यों करेगी? इसका एक से विवाह हो रहा है या दो से?"

मैंने कहा – "हाँ, यह गलत तो है, किंतु आर्यसमाज के अनुसार सही है। आर्यसमाज सिद्ध करता है कि देवर दूसरा वर होता है। इसीलिए वह वर की घोड़ी पर पीछे बैठकर आता है। 'देवकामा' के स्थान पर 'देवृकामा' पद, अर्थात देवर की कामना करने वाली – यह आर्यसमाज का ही मत है। आश्चर्य है, आपको ज्ञात नहीं। स्वामी जी ने भी देवर को द्वितीय वर माना है। अतः आप निश्चिंत रहें, यह अभी के लिए नहीं है, किंतु जब इसका यह वर्तमान वाला पति किसी प्रकार मर जाएगा, तब देवर नियोग करके इससे संतान उत्पन्न करेगा।"

वहाँ बैठा हुआ वर का पिता चीख उठा – "अरे-अरे! मंगल के समय अमंगल और असभ्यता की कैसी बातें कर रहे हो? मेरे पुत्र को मारना चाहते हो? इस पागल को, किस पागल ने यहाँ विवाह पढ़ाने के लिए बुलाया है?"

बाबूलाल भी कुपित होकर मुझसे बोले – "तुम सचमुच पागल पंडित ही हो, मेरी लड़की को विधवा करना चाहते हो। आर्यसमाज का कोई पंडित इनका अर्थ नहीं करता, वह तो ऐसे का ऐसा संस्कृत में ही पढ़ देता है। तुम ही पहले मुँहफट पंडित देखे हो।"

मैंने कहा – "यह आपकी बात ठीक है। किंतु मैं तो इस अर्थ को नहीं मानता हूँ। हम तो मानते हैं जैसे 'पुत्रकामा' का अर्थ 'पुत्र की कामना करने वाली' होता है, इसी प्रकार 'देवृकामा' का अर्थ 'देवर की कामना करने वाली' मानता हूँ। वैसे भी उक्त मंत्र में 'देवकामा' पद है, किंतु आर्यसमाजियों ने अपनी इच्छा से देवर को दूसरा पति बनाने के लिए वेद में 'देवृकामा' लिखकर प्रक्षेप कर दिया है। किंतु मैं तो यहाँ स्वामी जी और आर्यसमाज का ही अभिप्राय स्पष्ट कर रहा हूँ। मंत्र के साथ-साथ स्वामी जी के महान विचारों से भी जनता का परिचय हो, तो इसमें बुरा क्या है? अपनी ओर से तो मैं कुछ नहीं कह रहा, सब आपके ही संप्रदाय के अनुरूप है।"

मंडप में उपस्थित महिलाएँ 'छि-छि' करने लगीं। एक बुजुर्ग महिला खड़ी होकर ग्रामीण भाषा में स्वामी दयानंद जी को गालियाँ बकने लगी, उसे शांत कराया गया।

इतने में वर का मनचला भाई, जो कि कट्टर आर्यसमाजी ही था, बाबूलाल की ओर मुख करके बोल उठा – "आप लोग स्वामी जी के संप्रदाय से हैं, और विवाह भी संस्कार विधि से हो रहा है, फिर यहाँ स्वामी जी की निंदा क्यों करा रहे हैं? वे तो दया के सागर थे। अब इस कन्या में मेरा भी हिस्सा है तो है, उसमें समस्या क्या है? हमारे आर्यसमाजी नेता अभिनव-नैरुक्त दहलवी जी ने 'भाभी' शब्द का अर्थ 'भावी-पत्नी' कहा है, तो यह मेरी भावी पत्नी ही हुई। फिलहाल मैं पति न सही, उपपति तो हूँ ही। जैसे जिस दिन मंत्री जी उपस्थित न हों तो सभा के सारे काम उपमंत्री किया करता है, ऐसे ही मेरे ये बड़े भाई जब घर न रहेंगे, मैं उपपति इनका पूरा जिम्मा उठाऊँगा। स्वामी जी से लेकर हमारे श्री ब्रह्ममुनि तक ने इसे सत्य माना है, तो हमें भी इसे घृणित नहीं मानना चाहिए।"

मंडप में गहरी शांति छा गई। जिसे तोड़ते हुए वर के पिता ने मेरी ओर देखकर कहा – "यह गलत है। ऐसे तो तुम मेरा भी अधिकार इस कन्या पर बताओगे?"

मैंने उत्तर दिया – "बिलकुल, आपका भी अधिकार है। 'स्योना भाव श्वशुरेभ्य स्योना पत्ये' मंत्र का अर्थ स्वामी दयानंद ने लिखा है कि – 'हे वरानने, तू मेरा पिता, जो तेरा ससुर है, उसमें प्रीति करके... मेरे भाई जो तेरे देवर हैं, उनमें प्रीति के अधिकार से युक्त हो' (स.वि. पृ. १७४)। यहाँ स्वामी जी वधू के लिए ससुर और देवरों से समान प्रीति निभाने का वचन कह रहे हैं, अर्थात जैसे देवर (द्वितीय वर) को प्रीति का दान करो, ऐसे ही ससुर को भी दान करो। इसी प्रकार - 'साम्राज्ञी श्वशुरे भाव... साम्राज्ञी अधि देवृषु' – इस मंत्र में भी वधू का 'साम्राज्ञी (राजा की रानी) बनना' देवर और ससुर के लिए समान कहा है (स.वि. पृ. १३३)। यह स्वामी जी का आर्यसमाजी व्यवहार है, जिसके अनुसार आपका भी हिस्सा कन्या में है।"

तभी वर का बड़ा भाई (वधू का जेठ) बोल उठा – "अरे दुष्ट पंडित, मुझे क्यों वंचित किए दे रहा है? इस मंत्र में 'देवृषु' यह बहुवचन शब्द है, इसलिए छोटे और बड़े सभी देवरों को रानी बनाने की बात है। तभी बहुवचन की सार्थकता है। इसीलिए किसी स्थान के जाट थे जो कि एक लड़की के साथ ब्याह करके सब भाइयों का उसके साथ ब्याह समझते थे और सब अपना भाग उसमें से लिया करते थे। इसलिए स्पष्ट है, वेद के इस अर्थ को वे परंपरा से समझे हुए थे। स्वामी जी ने भी यह वैदिक अर्थ ही किए हैं, इसमें क्या दोष है?"

इतने में कन्या के ससुर के भाई (चचिया ससुर) बोल पड़े – "अजी, जब 'देवृषु' यह बहुवचन है तो 'स्योना भाव श्वशुरेभ्य' इस वेद मंत्र में 'श्वशुर' में भी बहुवचन है, और श्वसुर को देवर के समकक्ष रखा ही गया है, और देवर दूसरा पति है। इस नाते मेरा भी हिस्सा बनता है, मेरा भी ध्यान रखिए।"

मैंने कहा – "वाह-वाह! वर का पक्ष तो सच्चा दयानंदभक्त और आर्यसमाजी है।" ऐसे कहते हुए मैंने संस्कार विधि का अगला मंत्र पढ़ा – 'इमां त्वमिन्द्र... पतिमेकादशम् कृधि' – यह मंत्र पढ़कर मैं ज़रा रुक गया, ठहर गया।

मैंने देखा, बाबूलाल मुझे ही देख रहे थे। बाबूलाल के चेहरे पर आज चिरपरिचित मुस्कुराहट नहीं थी। कट्टर आर्यसमाजी और दयानंद भक्त होने को गौरव समझकर वे सिर पर उठाए घूमते थे, वह उन्हें आज जीवन का सबसे बड़ा कलंक लग रहा था। उनकी आँखें मुझसे कह रही थीं 'कुछ न कहो', पर मैं विवश था...

मैंने कहना शुरू किया – "विवाह के समय बोलने वाले इस मंत्र में स्वामी दयानंद कन्या और वर के लिए बड़ी महत्वपूर्ण शिक्षा देकर गए हैं। अतः मैं इस मंत्र का उनका ही किया हुआ अर्थ बोलकर बता देता हूँ... दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में इस मंत्र के अर्थ में लिखकर गए हैं – 'तू (वधू) इस विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ' (स.प्र. पृ. 97)। ...स्वामी दयानंद उस प्रकरण में कह गए हैं कि – 'अगर तुम्हारा यह जो इस समय सेहरा बाँधकर बैठा हुआ पति है, यह कल को नपुंसक निकले या कल को मर जाए या एक-दो संतान के बाद इसकी कामेच्छा समाप्त हो जाए, तो तुम एक-एक करके ग्यारह पुरुषों के साथ संभोग करके दस संतानें पैदा कर सकती हो।' ग्यारह नियुक्त पतियों की बात स्वामी जी ने कही है (स.प्र. पृ. १००)। अब जैसा ससुराल तुम्हें मिला है, एक देवर, एक जेठ और एक ससुर, चचिया ससुर को मिलाकर और भी हिस्सेदार घर में ही निकल आएँगे – बाहर भटकने की कोई ज़रूरत न पड़ेगी।"

फिर मैंने वर के पिता को निर्देशित करते हुए कहा – "लेकिन देखिए, यह स्वामी जी के कहे नियोग को गुपचुप नहीं करिएगा, बल्कि अपने सभी यार-रिश्तेदार, समाज के लोगो को बुलाकर, ढोल-नगाड़े वाले बुलाकर, गाँव में डोंडी पिटवाकर, सबको सुनाकर कि इस स्त्री का नियोग कराया जा रहा है, पूरे गाजे-बाजे के साथ, भोज आदि कराते हुए इसी प्रकार मंडप सजाकर नियोग कराइएगा। क्योंकि स्वामी दयानंद ऐसा ही कहकर गए हैं कि – 'जैसी प्रसिद्धि से विवाह होता है, ऐसे ही प्रसिद्धि से नियोग होना चाहिए' (सत्यार्थ प्रकाश पृ.९८ )। 

ताकि स्वामी जी की चारो ओर महिमा फैले। कोई मार्ग में जाए और उससे दूसरा कोई पूछे कि 'कहाँ जा रहे हो?' तो वह खुशी से बताए – 'अरे, वो बाबूलाल आर्य की कन्या का नियोग है, उसी की दावत उड़ाने और नियोग का खेला देखने जा रहा हूँ। बड़े पक्के और सच्चे समाजी हैं। वाकई दयानन्द सा रिसी कोई न हुआ'"

इतनी देर से सब सुन रहा वर, जो कि आर्यसमाजी नहीं बन सका था, बोल उठा – "अरे दुष्टों, तुम लोगों ने मेरी पत्नी को क्या पुरुषों को चढ़ाने वाली ट्रेन समझ लिया है? मेरी इस पत्नी में सब हिस्सा लेकर जीते रहना चाहते हो, और केवल मुझे ही मारना चाहते हो। मानो इसके साथ मेरा ही नहीं, तुम सबका भी विवाह हो रहा है। तुम लोगों ने पता नहीं यह कैसे गंदे-घिनौने संप्रदाय की कुसंगति प्राप्त कर ली है, जो ऐसे गंदे-गंदे अर्थ निकाल रहे हो। मुझे नहीं करना आर्यसमाज या स्वामी दयानंद के अनुसार विवाह। मैं तो किसी अन्य तिथि में असली सनातनी वैदिक पद्धति से ही विवाह करूंगा"

यह सुनकर मंडप में भयंकर सन्नाटा छा गया। बाबूलाल आर्य का चेहरा फक्क पड़ गया था। उन्हें न उगलते बन रहा था, न निगलते। क्रोध से लाल हो उठे, मुझे लगा बस मुझे मारने दौड़ पड़ेंगे। मैंने कहा – "मैंने नहीं कहा, यह सब स्वामी जी ही कहकर गए हैं। उनकी इन शिक्षाओं को बताना इस समय मेरा तो कर्तव्य था।"

कन्या की माता कमरे में भागी-भागी गई, दयानंद जी के चित्र और सत्यार्थ प्रकाश को गालियाँ देती हुई बाहर फेंकने गई। कुछ रिश्तेदार कहने लगे – "कैसा विचित्र संन्यासी था, विवाह के समय के मंत्रों के इतने घृणित अर्थ करके, कैसी विधियाँ बताकर गया। यह वैदिक नहीं, अवैदिक विवाह है।"

विवाह रुक गया। स्वामी जी के ही शब्दों को दोहराने मात्र से मामला बहुत बिगड़ चुका था। मैंने सरसरी नज़र से देखा तो बाबूलाल आर्य अपने आस-पास कुछ ढूँढ़ रहे थे। मैं खड़ा हो गया... उनकी नज़र कोने में रखी लाठी पर गई। मैंने तुरंत मंडप से कूदकर अलग हट गया... वे लाठी उठाकर मुझे और दयानंद दोनों को ही गालियाँ देते हुए मेरी ओर भागे। मैंने भी 'जय श्री राम' बोलते हुए तेज़ दौड़ लगाई...

तभी मेरे मुँह पर अचानक से पानी पड़ा। स्वप्न टूट गया। सम्मुख मेरा सहपाठी चारुदत्त खड़ा था। मैंने आँखें मींडते हुए कहा – "बड़ा बुरा स्वप्न था, सही समय पर जगा दिया।"

चारुदत्त ने कहा – "कोई बाबूलाल आर्य की कन्या का विवाह है, वे एक विद्वान विवाह पढ़ने वाले की खोज में हैं, जो कि आर्यसमाजी विधि से उनकी कन्या का विवाह करा सके। अतः गुरुदेव ने तुम्हें बुलाया है। शीघ्र चलो।"

✍️शचींद्र शर्मा 
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