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Friday, 22 May 2026

स्वयंसिद्ध तिथियाँ और रिक्ता का शास्त्रसम्मत रहस्य।

स्वयंसिद्ध तिथियाँ और रिक्ता का शास्त्रसम्मत रहस्य

वार-तिथि संयोग, सिद्ध योग और अंगारकी चतुर्थी की प्रामाणिक व्याख्या

मेरी पिछली पोस्ट (तिथि - वह क्षण जब ब्रह्मांड आपसे बात करता है ) पर एक पाठक ने बड़े सुंदर और सार्थक प्रश्न पूछे हैं - स्वयंसिद्ध तिथियाँ कौन सी हैं ? और क्या रिक्ता तिथियाँ किसी विशेष दिन पड़ने पर अपना स्वभाव बदल लेती हैं - जैसे शनिवार की नवमी या मंगलवार की चतुर्थी ?
इन प्रश्नों का उत्तर देते समय मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ - वैदिक ज्योतिष एक शास्त्र है, और शास्त्र की बात प्रमाण से होनी चाहिए। जो बात ग्रंथसम्मत है, वह ग्रंथसम्मत है। जो बात लोकप्रचलित है पर ग्रंथ में नहीं, उसे लोकप्रचलित ही कहना उचित है। और जो बात आधुनिक व्याख्या है, उसे आधुनिक व्याख्या ही रहने देना चाहिए हम इसी दृष्टि से आगे बढ़ते हैं।

साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्त - जब पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं रहती
धर्मसिंधु, मुहूर्त चिंतामणि और निर्णयसिंधु जैसे प्रमाणिक मुहूर्त ग्रंथों में एक अवधारणा है - 'स्वयंसिद्ध मुहूर्त' अथवा 'अबूझ मुहूर्त'। इन क्षणों में ग्रहस्थिति इतनी अनुकूल और संतुलित होती है कि तिथि दोष, करण दोष, वार दोष - इनका विचार करने की आवश्यकता नहीं रहती। शुभ कार्य का आरंभ निर्विघ्न होता है। वर्ष में ऐसे साढ़े तीन मुहूर्त शास्त्रसम्मत हैं।

पहला पूर्ण मुहूर्त है - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा। ब्रह्म पुराण में इसे सृष्टि के आरंभ का दिन कहा गया है। इसी तिथि को संवत्सर का उदय होता है, प्रकृति नवपल्लवित होती है, और सूर्य भूमध्य रेखा पार कर उत्तरायण की ओर बढ़ता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, दक्षिण में उगादी कहते हैं। इस दिन भवन निर्माण, व्यापार का आरंभ, नई परियोजना - सब कुछ पंचांग देखे बिना किया जा सकता है।

दूसरा मुहूर्त है - वैशाख शुक्ल तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया कहते हैं। 'अक्षय' - जिसका कभी क्षय नहीं होता। इस दिन की विशेषता यह है कि वैशाख मास में सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में स्थित होता है - यह प्रतिवर्ष निश्चित है। चंद्रमा की स्थिति वर्ष-दर-वर्ष भिन्न होती है क्योंकि उसकी गति तेज और अण्डाकार है, परंतु इस तिथि पर सूर्य की उच्चता इतनी बलशाली होती है कि अनेक पंचांगीय दोष स्वतः निष्प्रभावी हो जाते हैं। यह त्रेता युग के आरंभ की भी तिथि मानी गई है। स्वर्ण क्रय, विवाह, दान और निवेश - सब अक्षय फल देते हैं।

शास्त्रीय स्पष्टीकरण: कुछ ग्रंथों में अक्षय तृतीया पर सूर्य-चंद्र दोनों के उच्च होने का उल्लेख है, जो उन विशेष वर्षों के संदर्भ में है जब चंद्र भी वृषभ में ( 3 अंश या अधिक का हो ) तथा साथ मे सूर्य भी मेष राशि मे 10 अंश या इससे अधिक का हो तो यह एक दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग होता है जब ऐसा घटित हो।

तीसरा मुहूर्त है - आश्विन शुक्ल दशमी, अर्थात् विजयादशमी। नवरात्र की नौ रातों की संचित आध्यात्मिक ऊर्जा के पश्चात् यह वह क्षण है जिसे 'विजय काल' कहा गया है। वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान राम ने रावण-वध किया। इस दिन शस्त्र पूजन, वाहन क्रय, नवीन उद्यम, नेतृत्व ग्रहण - और उन सभी कार्यों के लिए जिनमें 'विजय' मुख्य उद्देश्य हो - यह तिथि अचूक मानी गई है।

चौथा - आधा मुहूर्त - कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा है। दीपावली के ठीक अगले दिन। गुजरात और पश्चिम भारत के व्यापारी समुदायों में यह नए व्यापारिक वर्ष का आरंभ है। इसे 'आधा' इसलिए कहा जाता है क्योंकि अनेक आचार्यों के मतानुसार इस दिन 'अभिजीत मुहूर्त' - दोपहर के मध्य का काल - तक ही पूर्ण दोषमुक्त अवस्था रहती है। इस अवधि में नए बहीखाते का आरंभ, आर्थिक अनुबंध और पूंजी निवेश शुभ फल देते हैं।

इन चार के अतिरिक्त लोक-आचार और देशाचार में कुछ और तिथियाँ भी अबूझ मानी गई हैं - माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् बसंत पंचमी, फाल्गुन शुक्ल द्वितीया अर्थात् फुलेरा दूज जो विवाह के लिए वर्ष की सर्वश्रेष्ठ तिथि मानी जाती है, आषाढ़ शुक्ल नवमी अर्थात् भड्डली नवमी, और कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात् देवउठनी एकादशी - जिस दिन भगवान विष्णु की योग-निद्रा टूटती है और सभी मांगलिक कार्यों का द्वार खुल जाता है।

रिक्ता तिथि का शास्त्रसम्मत स्वरूप - रिक्तता एक दोष नहीं, एक कार्य है

चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी - ये तीनों रिक्ता तिथियाँ हैं। 'रिक्त' का अर्थ है - खाली। और यही इन तिथियों का स्वभाव है - ये भरती नहीं, खाली करती हैं। मुहूर्त ग्रंथों में इन्हें नए मांगलिक कार्यों - विशेषतः विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ - के लिए वर्जित बताया गया है। जो बनाना हो, उसके लिए रिक्ता अनुकूल नहीं।
परंतु यही रिक्तता उन कार्यों के लिए अत्यंत शुभ है जिनमें हटाना, खत्म करना या त्यागना अभीष्ट हो। कर्ज चुकाना, पुरानी जर्जर संरचना गिराना, व्यसन छोड़ने का संकल्प, शल्य चिकित्सा - इन सबके लिए रिक्ता श्रेष्ठ है। तंत्र साधना की गुप्त विधियाँ भी रिक्ता तिथि में सिद्धि देती हैं। ब्रह्मांड में कुछ भी व्यर्थ नहीं - रिक्ता दोष नहीं, एक विशेष कार्य की ऊर्जा है।

शनिवार और रिक्ता का संयोग - शास्त्र क्या कहता है

मुहूर्त चिंतामणि तथा अन्य मुहूर्त शास्त्रों में वार और तिथि के संयोग से 'सिद्ध योग' और 'मृत्यु योग' का विवेचन है। शनिवार को रिक्ता तिथि पड़ने पर सिद्ध योग का निर्माण होता है - यह शास्त्रोक्त है।

इस संयोग को समझने के लिए दोनों की प्रकृति देखें। रिक्ता तिथि का स्वभाव है - हटाना, खाली करना, पुनर्मूल्यांकन करना। शनि का स्वभाव है - अनुशासन, कर्म का यथार्थ, दीर्घकालिक स्थायित्व और न्याय। जब 'हटाने की ऊर्जा' शनि के 'दीर्घकालिक अनुशासन' के साथ मिलती है, तो एक विशेष बल बनता है।
शास्त्रों में इस संयोग को ऋण मुक्ति, पुरानी देनदारियाँ चुकाने, संपत्ति का विभाजन, और उन कार्यों के लिए उत्तम बताया गया है जिनमें किसी पुराने बोझ से मुक्ति अभीष्ट हो। 'दीर्घकालिक निवेश' और 'शेयर बाजार' जैसे आधुनिक कार्यों का प्राचीन ग्रंथों में स्वाभाविक रूप से उल्लेख नहीं है - परंतु शनि की प्रकृति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि दीर्घावधि और अनुशासित वित्तीय निर्णय लेने का यह एक अनुकूल समय है। यह व्याख्या है, शास्त्रोक्त वचन नहीं - और इसे इसी रूप में समझा जाए।

मंगलवार की चतुर्थी - अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का प्रामाणिक रहस्य
जब मंगलवार के दिन चतुर्थी पड़ती है, तो वह 'अंगारकी चतुर्थी' कहलाती है। यह सामान्य सिद्ध योग की परिभाषा में नहीं आती - क्योंकि मंगलवार का सिद्ध योग जया तिथि के साथ बनता है, चतुर्थी के साथ नहीं। फिर भी यह संयोग वैदिक परंपरा और उपचारात्मक ज्योतिष में सर्वोच्च माना गया है।

इसकी कथा स्कंद पुराण और गणेश पुराण में मिलती है। भगवान शिव और पृथ्वी माता के पुत्र अंगारक ने भगवान गणेश की अत्यंत कठोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर गणपति ने उन्हें माघ कृष्ण चतुर्थी के दिन - जो मंगलवार था - दर्शन दिए। अंगारक ने वर माँगा कि इस दुर्लभ संयोग पर जो भी आपका व्रत और पूजन करे, उसके जीवन के समस्त संकट नष्ट हों। गणेशजी ने 'तथास्तु' कहा और घोषित किया कि आज से तुम 'मंगल ग्रह' के नाम से तीनों लोकों में विख्यात होगे।

(शास्त्रीय स्पष्टीकरण: अंगारक की उत्पत्ति के विषय में पुराणों में भिन्न-भिन्न मत हैं। शिव पुराण और स्कंद पुराण की मुख्य धारा उन्हें शिव-पृथ्वी पुत्र मानती है। एक अन्य पाठ में महर्षि भारद्वाज का उल्लेख है। दोनों मत प्रचलित हैं - परंतु शिव-पृथ्वी वाला मत अधिक व्यापक रूप से स्वीकृत है।)

चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित है - वे विघ्नहर्ता हैं, सभी बाधाओं के नाशक। मंगलवार का स्वामी मंगल ग्रह है जो शक्ति, साहस और पराक्रम का प्रतीक है। जब विघ्नहर्ता की तिथि और मंगल के तेज का संयोग होता है, तो जीवन के जटिलतम और जिद्दी संकट भी भस्म होने की क्षमता इस दिन में आ जाती है।
मंगल ग्रह को ज्योतिष में 'ऋण का कारक' माना गया है - अर्थात् मंगल के प्रभाव से ऋण की स्थिति बनती है। अंगारकी चतुर्थी पर मंगल की विधिवत उपासना का अभिप्राय यह है कि इस ऋण-कारक ग्रह को प्रसन्न कर उसकी पीड़ा का शमन किया जाए - ताकि ऋण-जनित कष्ट घटे। यह 'ऋण मोचन' मंगल का गुण नहीं, मंगल की शांति का फल है - यह भेद समझना आवश्यक है।

इस दिन विशेष रूप से तीन प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। पहला - मंगल दोष का शमन। जिनकी कुंडली में मंगल दोष है या मंगल वैवाहिक जीवन में कलह दे रहा है, उनके लिए यह दिन अत्यंत फलदायी है। उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर में इस दिन विशेष 'मंगल भात पूजा' होती है। दूसरा - ऋण-जनित पीड़ा का शमन। मंगल की शांति से ऋण के कारक का प्रभाव घटता है और आर्थिक स्थिति सुधरती है। तीसरा - जीवन में बार-बार आने वाली बाधाओं और शत्रु-पीड़ा का नाश। इस दिन गणेशजी और मंगल ग्रह का एकीकृत पूजन इस उद्देश्य के लिए अत्यंत प्रभावी है।

यह व्रत सूर्योदय से आरंभ होकर चंद्रोदय तक रखा जाता है। रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर पारणा होती है। अन्न, वस्त्र, गुड़, तिल और मोदक का दान विशेष फलदायी है।

वार-तिथि के अशुभ संयोग - जिनसे बचना आवश्यक है
जब वार और तिथि की ऊर्जाएँ परस्पर विरोधी होती हैं, तो मुहूर्त शास्त्रों में 'मृत्यु योग' और 'अधम योग' का वर्णन है। इनमें शुभ या नए कार्य आरंभ करने पर बिना कारण बाधाएँ और हानि का अनुभव होता है।

रविवार या मंगलवार को नंदा तिथि - प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी - पड़ने पर मृत्यु योग बनता है। यही नंदा शुक्रवार को सिद्ध योग बनाती है। गुरुवार को रिक्ता तिथि पड़ना मृत्यु योग है - जबकि शनिवार को वही रिक्ता सिद्ध योग बन जाती है। बुधवार को जया तिथि अशुभ है, जबकि मंगलवार को वही जया सिद्ध योग है। सोमवार या शुक्रवार को भद्रा तिथि - द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी - पड़ने पर भी विशेष सावधानी आवश्यक है।

यह समझ लेना सबसे महत्वपूर्ण है - कोई भी तिथि स्वयं में पूर्णतः शुभ या पूर्णतः अशुभ नहीं है। वार के साथ उसका संयोग, कार्य की प्रकृति, और करने वाले व्यक्ति की कुंडली - ये तीनों मिलकर उस क्षण का वास्तविक प्रभाव निर्धारित करते हैं।

ऋषियों ने पंचांग को केवल एक कैलेंडर नहीं बनाया था। उन्होंने उसे एक ऐसा दर्पण दिया जिसमें ब्रह्मांड की लय दिखती है। स्वयंसिद्ध मुहूर्त उन क्षणों को दर्शाते हैं जब यह लय अपनी चरम अनुकूलता पर होती है। रिक्ता तिथियाँ उस लय के उस पहलू को प्रकट करती हैं जो हटाने और शुद्ध करने का कार्य करता है। और वार-तिथि के विशेष संयोग - जैसे शनिवार की नवमी और मंगलवार की चतुर्थी - यह सिखाते हैं कि एक ही ऊर्जा अलग-अलग संदर्भ में अलग-अलग रूप धारण करती है।

शास्त्र की भाषा में बोलें तो - काल सापेक्ष है, निरपेक्ष नहीं। और यही वैदिक विज्ञान की वह दृष्टि है जो हजारों वर्ष पहले भी उतनी ही गहरी थी जितनी आज प्रासंगिक है।

तिथि वह क्षण है जब ब्रह्मांड आपसे बात करता है। जो पंचाङ्ग की भाषा सीख लेता है, वह उस बातचीत में भागीदार बन अपने कार्य सफल करता है ।

- ✍️आचार्य ऋतुराज दुबे
Way to Happiness - Paravigyan ki Pathshala
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