मैं बोलता उत्तावला,पर धीर भीर गंभीर हूं।।
हां मैं ढाढी....
1
पाषाण युग का दूरदर्शन,महाभारत का मैं संजय।
रूकमणि का प्रेम पत्र,प्रेम गाथाओं का मैं धन्जय।।
रामायण में रचित हूं, गुरुग्रंथ क़ुरआन से परिचित हूं।
युगों-युगों का यायावर,कथित व्यथित हूं वंचित हूं।।
खालसा सनातनी इस्लाम में समानता।
नानक महोम्मद बुध्दाय नमो:
श्रीकृष्ण को मैं मानता।।
विरास में मिरास की,मैं लय बंधी लकीर हूं।
हां मैं ढाढी मीर हूं,हां हां मैं ढाढी मीर हूं।।
2
शुभ अवसर पर मुझे बुलाते,मंगल सुमंगल मांगलिक हूं मैं।
मैं हूं सरस्वती का सुपुत्र,कुंम कुंम स्वास्तिक सा दार्शनिक हूं मैं।।
सामवेद में व्याख्या वर्णित,मैं रागों का वायक पायक।
उत्तर भारत की उज्ज्वल जाति,मैं जाटों का गाथा गायक।।
विरदाता रसों छंदो में,दुलराता गद्यों पदों में।
स्वर व्यंजन बहु शब्द संजो के, निश्चल प्रेम भरता परिंन्दो में।।
मैं घुमन्तू घट घट का,वही पथिक प्राचीर हूं।
हां मैं ढाढी मीर हूं, हां हां मैं ढाढी मीर हूं।।
3
मैं था देवलोक का वासी,मां धरती पर मैं प्रवासी।
गन्धर्व की सन्तान हूं मैं,मुझमें सम्माहित द्वादश राशि।।
राष्ट्रहित में रक्त बहाया, स्वतंत्र राष्ट्र का मैं अभिलाषी।
नबूअत की मुहर को चूमा,हज़रत काशिम का मैं हूं मिरासी।।
नानकदेव का पंजप्यारा मैं,बाला मरदाना पर्व प्रकाशी।
मैं मध्यस्था हिंदु मुस्लिम,मानता मक्का,जाता काशी।।
देवलोक का दूत हूं मैं,फिर भी क्यूं अछूत हूं मैं।
या सामंतवाद ने ठगा मुझे,कभी कभी यूं लगा मुझे।।
सिंन्धुघाटी सभ्यता का, आखिरी राहगीर हूं।
हां मैं ढाढी मीर हूं, हां हां मैं ढाढी मीर हूं।।
4
मैघ मल्हार से मैह बरसाता,दीपक राग से आग लगाता।
बैजूबावरा तानसेन हूं,
भाईचारा मैं अमन चैन हूं।।
चंन्द गंग बैताल मुझी में,गीत राग लय-ताल मुझी में।
हरियल की हरियाली हूं मैं,खुसरो की खुशहाली हूं मैं।।
गालिब के गलियारे मुझमें,
मीर तक्की के पारे मुझमें।
बुल्लेशाह की वाणी हूं मैं,
गंगा जमजम पाणी हूं मैं।।
विजय कवि अक्खासर लिखता,वैसी कलम कहानी हूं मैं।
गिरवर सरवर तरवर जैसा,अंनन्त संत फकीर हूं।
हां मैं ढाढी मीर हूं, हां हां मैं ढाढी मीर हूं।।
स्व रचित-विजय कवि अक्खासर 8290471580
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ALI GHANI - Padmashri
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