सर्दियों रा दिन हा, पण मरुधरा में दुपार री धूप कड़क पड़ रही ही। देवजी री दुकान रे ठीक बाहर एक बहुत बडो और पुराना **नीम रो पेड़** हो। उण नीम री ठंडी छांव में देवजी एक बडो मटको और प्याऊ लगाकर राखता, ताकि आबा-जाबा वाले राहीगीर ठंडो पाणी पी सके।
दुपार रा तीन बज्या हा। स्टेशन माथे पूरो सन्नाटो हो। उण बखत एक सूट-बूट पहर्योड़ो शहर रो अमीर मिन्ख (जो कड़ेई बडो अफसर लाग रह्यो हो) स्टेशन सूं बाहर निकल्यो। उणने आगे जावण सारु कोई साधन कोनी मिल रह्यो हो। कड़क धूप और भूख-तीश सूं उणरो हाल बेहाल हो गयो।
वो थक्यिो-पार्क्यो देवजी री दुकान कने आयो और बोल्यो—*"बाबा, कनै ही कोई चोखो होटल है कँई? मने घणी जोर री भूख लागी है।"*
देवजी हाथ जोड़कर बोल्या—*"हुकम, अठे दूर-दूर तक कोई होटल कोनी है। इण छोटे से स्टेशन माथे सिर्फ म्हारी आ छोटी सी दुकान ही है।"*
वो अमीर मिन्ख परेशान हो गयो। उणने पैलां तो देवजी री दुकान सूं पानी पीकर अपनी तीश बुझाई, फिर बोल्यो—*"बाबा, थारी दुकान में जो भी बिस्कुट-नमकीन है, वही मने दे दो, भूख रे मारे म्हारो जीव निकल रह्यो है।"*
देवजी री दुकान में बिस्कुट रा पैकेट तो हा, पण देवजी देख्यो कि ओ मिन्ख घणो थक्यिोड़ो है और इणने बिस्कुट सूं संतोख कोनी होसी।
उण वक्त देवजी कने झोंपड़ी सूं आयोड़ो उणरो खुद रो दुपार रो खाणो (टीफन) पड्यो हो, जिणमें **बाजरे रो सोगरो (रोटी), काचरी री चटनी और घर रो सफेद माखण** हो। देवजी पूरे दिन भूखा हा और ज्यूं ही खुद खाणो खावण वाला हा, कि ओ मुसाफिर आ गयो।
देवजी एक पल भी कोनी सोच्यो। उणने अपनी थाली उण अमीर मिन्ख रे आगे रख दी और बोल्या:
*"हुकम, बिस्कुट सूं पेट कोनी भरेला। थे म्हारो ओ रूखो-सूखो खाणो जीम लो। म्हारै राम जी री प्रसादी समझकर आरोगो।"*
उण अमीर मिन्ख ने पैलां तो संकोच होयो, पण भूख इतनी तेज ही कि उणने वो बाजरे रो सोगरो और काचरी री चटनी खानी शुरू करी। उणने वो खाणो इतना सवाद लाग्यो कि वो उंगलियां चाटतो रह गयो। उणरो पेट भर गयो और हिवड़े में संतोख आ गयो।
खाणो खावण रे बाद उण अमीर मिन्ख री जान में जान आई। उणने अपने चमड़े रा बैग सूं **पांच हजार रुपया** काढ़्या और देवजी ने देवा लाग्यो—*"बाबा, इण सुसान जगह माथे थे मने जो अमरीश ज्यूं खाणो जीमायो है, आ उणरी कीमत है। प्लीज, थे मना मत करजो।"*
देवजी मुस्कुराया, हाथ जोड्या और बहुत धीमे सूं बोल्या:
*"हुकम, मरुधरा री माटी में अन्न बेचना पाप मान्यो जावे सा। थे म्हारे ओरण (आँगन) आया, तो थे म्हारा मेहमान हो। और मेहमान सूं खाणो जीमावण रा पीसा लेवणो म्हारो धरम कोनी। आ पांच हजार री थैली थारे बैग में ही चोखी लागे, म्हारी कुटिया में कोनी।"*
वो अमीर मिन्ख देवजी री आ बात सुणकर दंग रह गयो। उणने लाग्यो कि आज रे जमाने में भी ऐसा मिन्ख है, जो खुद भूखा रहकर पराये री भूख बुझावे और उणरो मोल भी कोनी लेवे! वो देवजी रा पग धोया और चुपचाप वहां सूं रवाना हो गयो।
पण वो अमीर मिन्ख कोई साधारण आदमी कोनी हो, वो रेलवे रो बडो कमिश्नर (अफसर) हो। दस दिन बाद, उण स्टेशन माथे एक सरकारी आदेश आयो। उण अफसर ने देवजी री नि:स्वार्थ सेवा देखकर उण छोटे से स्टेशन रो नाम ही बदलवा दियो और वहां एक बडो, पक्को **'निशुल्क अन्न-क्षेत्र और प्याऊ'** बणवा दियो, जिणरो पूरा खरच सरकार उठावती और उणरो देखरेख रो जिम्मो देवजी ने सोंप दियो, ताकि कोई भी मुसाफिर कदी उण स्टेशन माथे भूखा-तीशा न रहे।
### हिवड़े री सीख
राजस्थानी में कवे है नी—
**"अणमंग्या जो देत है, उणरो मोटो भाग।**
**तपती धूप में जो बणे, सीतल मीठी काग॥"**
देवजी री आ कहानी म्हाने ओ ही सिखावे कि सेवा सारु किसी आफत री जरूरत कोनी होवे, बस कोई भूखा मिन्ख दिखे और अपणो निवाला उणने दे देणो ही सबसूं बडो धरम है।
**हुकम, आ मीठी कहानी थने कस्यां लागी?**
✍️Sushimarwadi
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