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भगवान श्री शरभेश्वर यह भगवान शिव का एक अत्यंत उग्र प्रचंड एवं गुप्त रुप है .. तंत्र क्षेत्र मे ये अत्यंत उच्च कोटी की देवता के रुप मे पूजे जाते है .. शत्रू बाधा निवारण हेतु , ग्रह बाधा निवारण हेतु , रोग बाधा एवं अकालमृत्यु निवारण हेतु , प्रेतबाधा तंत्र बाधा निवारण हेतु यह अत्यंत सटिक , अत्यंत उच्च कोटी की साधना मानी जाती है .. यह शिव का अत्यंत गुप्त रूप होने से बहुत कम लोग इनके बारे मे जानते है .. इनके मंदिर एवं विग्रह बहुत कम देखने को मिलते है .. आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे यह उच्च श्रेणी की साधना मानी जाती है .. दस महाविद्या साधना मे इनकी साधना का अपना एक महत्त्व है ..
इनकी उत्पत्ती के बारे मे पुराणों मे बताया है की नृसिंह अवतार के समय जब भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यपू का वध किया तो भगवान नृसिंह की उग्रता प्रचंड होने से वे शांत नही हो पा रहे थे तब देवताओं के प्रार्थना पर भगवान महादेव ने एक विचित्र पक्षी का रुप धारण किया जिसका मुंह उल्लु की तरह , नेत्र मे अग्नि सूर्य चंद्र और धड मनुष्य की तरह और चार हाथ जिसमे विशेष आयुध धारण किये हुये थे .. उनके नख वज्र के समान तीक्ष्ण , दो पंख जिनमे काली एवं दुर्गा का वास है तथा हृदय मे जठरानल और पेट मे वडवानल अग्नि विराजमान है .. कटिप्रदेश से बाद का अंग हिरण की तरह एवं पूंछ सिंह के समान लंबी है .. उरु प्रदेश मे उन्होंने व्याधि एवं मृत्यु को धारण किया है .. उन्हे शरभ , पक्षीराज , आकाशभैरव , शालुव आदि नामों से जाना जाता है ..
ऐसे शरभ पक्षिराज रुपी शिव अवतार ने भगवान नृसिंह को चोंच मार उन्हे मूर्छित कर दिया .. अपनी पूंछ से उनके दोनो पैर बांध दिये और अपने दोनो पिछले पैर नृसिंह के पैरों पर रखे और अपने आगे के दो पैर भगवान नृसिंह के छाती पर रखे और अपने हाथों से नृसिंह के हाथो को पकडकर आकाश मे उडकर भगवान नृसिंह के उग्र स्वरुप से कई ज्यादा उग्र स्वरुप धारण किया जिससे भगवान नृसिंह शांत हुये और उन्होंने शरभरुपी शिव की प्रार्थना कर उनकी स्तुती की और अपने उग्र स्वरुप का विसर्जन किया तो शिवजी ने अपने शरभ स्वरुप मे भगवान नृसिंह के चर्म को प्रिय मानकर व्याघ्रांबर धारण किया ..
भगवान श्री शरभेश्वर की साधना एक उच्च कोटी की है और साधारण साधक इस साधना को ना करे .. योग्य अधिकारी गुरु से शरभ दिक्षा और मंत्र प्राप्त कर उनके निर्देशन मे ही शरभ साधना करे .. बिना दिक्षा शरभ साधना करना घातक है क्योंकि इनकी साधना एक उग्र साधना है .. शत्रू बाधा निवारण हेतु शायद इससे बढकर साधना नही हो सकती .. शत्रू बाहर के और अपने काम क्रोध रुपी अपने अंदर के शत्रू भी .. अकालमृत्यु एवं रोग बाधा निवारण के लिये भी यह साधना काम करती है .. तंत्र प्रयोग का निवारण हेतु भी इनकी साधना सटिक फल देती है .. आत्मरक्षा हेतु इनकी साधना किसी भी बडे से बडे तंत्र प्रयोग या बाधा से आपका रक्षण करती है ..
भगवान शरभेश्वर परम दयालु है .. वे अपने भक्तों को कष्ट देने वाले शत्रूओं का और अपनी भक्तों की समस्त बाधाओं का नाश करते है .. इनकी साधना मे "दारुण सप्तक " का पाठ एक अत्यंत सटिक फल प्रदान करनेवाली साधनाविधी है .. ऐसे अदभुत पराक्रमी श्री शरभेश्वर की उपासना बहुत विरले भक्त ही कर पाते है .. भगवान शरभ के उपासक पर बाकी देवता अपने आप कृपा करते है .. पुरे संसार मे गिने चुने साधक ही शरभ साधना कर पाते है यही एक गूढ रहस्य है .. दस महाविद्या साधना , शरभ साधना , प्रत्यंगिरा साधना , गुह्यकाली , कामकला काली , सिद्धिलक्ष्मी आदि सब साधनाएं वर्गीकृत है .. इनके आध्यात्मिक कोड खुलना सुलभ नही है .. इस लिये शायद गिने चुने लोग ही इस स्तर की साधना तक पहुंच पाते है ..
शरभ का मंत्र बीज आकाश तत्त्व का है .. इनकी साधना से आकाशगमन प्राप्ती तथा कुंडलिनी जागरण सुलभ हो जाती है .. योग मार्ग मे इनकी साधना से गुप्त सिद्धिया प्राप्त होती है .. प्राचीन तंत्र ग्रंथ शरभ तंत्रम तथा आकाशभैरव तंत्र मे इनकी साधना का विस्तृत वर्णन है .. दतिया पीतांबरा पीठ के राष्ट्रगुरु महाराज जी ने शरभ साधना पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी ..
भारत वर्ष मे इनके साधक बहुत कम है और गुप्त रुप से साधनारत है .. अपने सदगुरु से प्राप्त विधी से ही इनकी साधना करे अपने मन से ना करे .. शारीरिक मानसिक शुद्धता रखे .. इस साधना की उच्च स्तर की श्रेणी को ध्यान रखकर ही इनकी साधना करे ..
आध्यात्मिक साधना क्षेत्र मे इन्हे एक अत्यंत उच्च स्तर की साधना के रुप मे देखा जाता है .. दस महाविद्या की साधना मे शरभ साधना का अपना एक महत्त्व है .. अगर आपको आपके सदगुरु द्वारा शरभ मंत्र दिक्षा प्राप्त है तो निश्चित ही आप अत्यंत सौभाग्यशाली साधक है ..
किसी भी अच्छे आध्यात्मिक गुरु से दिक्षित होकर उनके व्यक्तिगत मार्गदर्शन मे आध्यात्मिक क्षेत्र की दुर्लभ साधनाये संपन्न कर आध्यात्मिक उन्नती की ओर अग्रेसर होना और मनुष्य जन्म का यथार्थ रुप से कल्याण कर लेना हमारे ही हाथ मे है ..
एक मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ती कुएं के मेंढक की तरह या तो साधारण स्तर का जीवन यापन कर अपने मानसिक स्तर पर अपने आप को गौरवान्वित महसुस कर सकता है या
किसी योग्य आध्यात्मिक सदगुरु की शरण प्राप्त कर दस महाविद्या या शरभ प्रत्यंगिरा जैसी ब्रह्मांडीय साधना कर मनुष्य जन्म का यथार्थ रुप मे कल्याण कर सकता है ..
मनुष्य के इतिहास मे प्राचीन आध्यात्मिक साधनाओं का अभ्यास बहुत कम देखा गया है शायद यह विराट आध्यात्मिक शक्तिया वर्गीकृत होने के कारण अपने साधक को चुनती है और उसे किसी ना किसी माध्यम से योग्य गुरु तक पहुंचा कर अपनी छाया मे लाकर उसे अपनी कृपा प्रदान करती है ..
इस लिये आध्यात्मिक साधना क्षेत्र हमेशा से ही बहुत गूढ रहस्यपूर्ण रहा है ..
आज शरभ साधना पर लिखते हुते यह एहसास होता कि वर्षों से आ रही साधना पद्धती के बावजूद कितने कम लोग भगवान शरभेश्वर से परिचित है ..
कितने लोग दस महाविद्याओं का नाम जानते है ..
और भी ऐसी बहुत सारी आध्यात्मिक शक्तिया है जैसे प्रत्यंगिरा , गुह्यकाली ,कामकलाकाली , सिद्धीलक्ष्मी आदि जिन्होने अपना स्वरुप गूढ रहस्यपूर्ण ही रखा है और सामान्य लोग इनसे परिचित नही हो पाये ..
और ऐसा क्यों इसका जवाब पता नही ..
भारत वर्ष मे हिंदु परिवार मे जन्म लेकर भी अपनी आध्यात्मिक विरासत हम लोग पहचान नही पाते शायद यही भगवती की माया हो सकती है ..
आज भगवान शरभेश्वर से यही प्रार्थना है की हमारी प्राचीन सभ्यता , हमारी प्राचीन संस्कृती एवं हमारे देवी देवता का मजाक उडाकर इस सभ्य संस्कृती से साथ खिलवाड करने वाले शत्रू तत्त्व को भगवान शरभ इस ऋषीमुनीयों की भारत वर्ष की पवित्र भूमी से जड से उखाडकर फेक दे ..
जिस दिन हम सारे लोग वास्तविक साधक बनकर बगलामुखी साधना , शरभ साधना , प्रत्यंगिरा साधना , छिन्नमस्तिका साधना , धूमावती साधना करने लगेंगे तो किस शत्रू की मजाल है जो हमारी संस्कृती पर तिरछी नजर डालने की हिम्मत कर सके ..
उचित आध्यात्मिक साधनाये करते रहो ..
सब उर्जा का खेल है . साधनाओं के माध्यम से आध्यात्मिक उर्जा का निर्माण होना चाहिये . यही उर्जा हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का निराकरण कर सकती है . सिर्फ खयाली पुलाव से या बडी बडी बाते करने से कुछ नही होगा .
कितने लोग रोज कुछ अच्छी आध्यात्मिक साधना करते है ? हमे हमारे पूर्वज ऋषी मुनियों की आध्यात्मिक विरासत को पहचानना चाहिये .
आज इस दिवस पर भगवान शरशेश्वर एवं भगवती प्रत्यंगिरा देवी के चरणों मे यही निवेदन है कि वे हम सब पर अपनी कृपादृष्टी बनाये रखे .. यही उनसे हाथ जोडकर प्रार्थना है .. ॐ शम ..
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